Friday, 16 November 2012

बहुत फ़ासले हैं

लहर से ठहर तक
तगर से ज़हर तक
बहुत फ़ासले हैं
डगर से शहर तक

जतन से पतन तक
अगन से पवन तक
बहुत फ़ासले हैं
चमन से अमन तक

इधर से उधर तक
शिखर से अधर तक
बहुत फ़ासले हैं
मेहर से क़हर तक

जुनूँ से सुकूँ तक
चलूँ से रुकूँ तक
बहुत फ़ासले हैं
कटूँ से झुकूँ तक

लगूँ  से बनूँ तक
जलूँ से बुझूँ तक
बहुत फ़ासले हैं
सहूँ से कहूँ तक

सितम से रहम तक
नरम से गरम तक
बहुत फ़ासले हैं
जनम  से मरण तक

महक से बहक तक
सिसक से पलक तक 
बहुत फ़ासले हैं
सड़क से फलक तक


अकल से शकल तक
तरल से गरल तक 
बहुत फ़ासले हैं
अज़ल से गज़ल तक

(अपूर्ण)

Tuesday, 13 November 2012

पर्सनैलिटी डेवेलपमेंट वो भी हिंदी में

पर्सनैलिटी डेवेलपमेंट की क्लास । स्वाभाविक रूप से, अंग्रेजी में ही थी, है और रहेगी भी । ये क्लास बैंक के सभी कर्मचारियों के लिए वैसे ही कम्पलसरी थी जैसे जैसे खच्चर के लिए घास, चरोगे नहीं तो खाओगे क्या? कद्दू!!
सभी लगे थे । मैडम अलग लगी थीं, ट्रेनीज़ अलग ! अलग अलग ।मैडम को सब्जेक्ट मैटर की कोई ख़ास चिंता नहीं थी क्यूंकि उन्हें ये ब्रह्मज्ञान हो गया था कि अंग्रेजी में ताबड़तोड़ बकैती कर लेने के बाद इस बात का कोई महत्व नहीं रह जाता कि बात में दम था या नहीं,  इसे सुरक्षा परिषद् में भारत की परमानेंट सीट की तरह समझा जा सकता है अगर मूड करे तो
...... नहीं तो हमें भी बसंती की तरह बे-फजूल बातें करने की आदत तो है नहीं ।

ट्रेनीज को भी सब्जेक्ट मैटर की कोई ख़ास चिंता नहीं थी क्यूंकि वो मैडम को देख रहे थे और अभी कुछ और देर तक घूर घूर के इस ईश्वरीय कृति को हर तरह से एप्रूवल सर्टिफिकेट देने पर उतारू थे । क्लास चुर्रैट चल रही थी संसद की तरह ।

मैडम के सुंदर मुख विवर से अंग्रेजी के जटिल शब्द ऐसे झर -झर झर रहे थे जैसे जुगाली परस्त गैया के मुँह से श्वेत पदार्थ ।

पीछे बैठे रामनिहोर असंतुष्ट विधायक की तरह ही असंतुष्ट थे। पसीना पसीना थे जिसका कारण हसीना नहीं थी । तंग आकर, पगलाकर और फाइनली झुंझलाकर रामनिहोर बोल उठे-

"मैडम जी आपकी अंग्रेजी तो कर्री है लेकिन मुझे क्लर्की का एग्जाम पास करने जितनी ही अंग्रेजी आती है !
क्या मेरा पर्सनैलिटी डेवेलपमेंट हिंदी में नहीं हो सकता?"

सन्नाटा!..........

मासूम रामनिहोर, मासूम प्रश्न ।
आप ही बताइए कोई भी बड़ा काम कभी हिंदी में हो सकता है क्या ??
न भूतो न भविष्यति!
हा हा हा

हाँ जी साहब !



ये देश अभी विकासशील है साहब
यहाँ मुर्दा भी मरीज़ है साहब

किसी को मयस्सर है दोनों जहाँ की खुशी
किसी को एक रोटी, एक कमीज़ है साहब

क्या मजलिसें, क्या अदालतें, क्या तो मुंसिफी
जम्हूरियत अमीरों की कनीज़ है साहब

ये शायर बहुत बद्तमीज़ है साहब
सच बयानी की इसको तमीज़ है साहब

पीना है सस्ता ही तो पसीना पी लीजे
साफ़ पानी बहुत महँगी चीज़ है साहब

इस गेहूँ मे मिला है लहू किसानों का
ये रोटी बहुत लज़ीज़ है साहब

जहाँ को तलब हुआ करे मजाज़-ओ-ग़ालिब की 
हमें तो खुद की ग़ज़ल ही अज़ीज़ है साहब !

 

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