Wednesday, 15 August 2012

सिर ऊपर

पाँव सने है 
बुरी तरह से 

गंदा कीचड़
जात पात का 
बिरादरी का
गाढा दलदल

मज़हब का
वो पैना काँटा 
धँसा हुआ है
एड़ी में फिर 

शुक्र है फिर भी 
सिर ऊपर है
सोच रहा है 
निकलूँ कैसे 

इंसानों में 
इसीलिए तो 
सिर ऊपर
दे रखा उसने 

थोड़ा ऊपर सोच सके गर
दलदल से बाहर आ पाए !

बदरंग सही


भीड़ में घुला
बेनाम चेहरा
अनजान था पहले 

राह चलते 
दूब पे लिपटी
धानी-हल्की पीली नज़्म दिखी इक 

नज़्म उठा के
गौर से परखी 
चेहरे पे मल दी
ओढ़ ली पूरी

अब मैं खुद से नहीं
उस नज़्म से हूँ
ज़िंदा- धानी सा 
हल्का पीला

बदरंग सही- 
पहचान तो जाते हैं सब !

Wednesday, 25 July 2012

ज़रूरत


न घर, की न बस्ती की, न बिस्तर की ज़रूरत 
हर दरिया को है उसके समंदर की ज़रूरत 

मरहम की इन्तेहा हुई पर घाव न सम्हला 
तेज़ाब की शीशी तो है, नश्तर की ज़रूरत 

क्या खूब बनाये हैं तूने काँच के ख़ुदा 
है दिल में हौसला बस इक पत्थर की ज़रूरत 

हर आखिरी बाज़ी को समझ ताश का क़िला 
पुरज़ोर गिराओ कि है टक्कर की ज़रूरत 

दो रोटियाँ भूखे को मिलें ना मिलें सही 
दो बोल प्यार के मगर अन्दर की ज़रूरत 

मिल जाए अगर चैन-ओ-अमन काफ़िरों से ही 
दुनिया को न मस्जिद की न मन्दिर की ज़रूरत !
 

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