वो बोलता नहीं कुछ भी
बस लिखा करता है
चुप चुप सा रहता है
कुछ कम दिखा करता है
कुछ को लगा के मौन है वो
कुछ को लगा के कौन है वो
कोई पूछ ले तो कहता था
"unknown" है वो...
वो भीड़ में शामिल है
पर हिस्सा नहीं उसका
वो खुद कहानी रचता है
पर किस्सा नहीं उसका
वो दिखेगा हर राह में
पर मोड़ आने पे
वो बोलेगा हर बात पे
पर समय आने पे
बस इंतज़ार करता है
और सोचता है ये
वक़्त कितना और है अब
प्रलय लाने में...
इतने कायर भी नहीं हम
मर तो जाएँ मुल्क पे कल
मौत के बाद सोचते हैं
और क्या रह जायेगा !
नाम पत्थर पर खुदा सा
इक गला माँ का रुँधा सा
इक शहर मेरे बिना सा
इक मेडल सीने बिना सा
इक दफ़ा जनता का रेला
हर दफ़ा बेमेल मेला
हर दफ़ा बेमेल मेला
याद उनकी है दिलाता
जोकि मिट्टी हो गए बस
इक अधूरी आन पे बस
उनकी हसरत दम-ब-दम बस
बोलें वन्दे मातरम बस
सरफरोशी की तमन्ना
उनकी हर इक साँस में बस
और इक हम भी यहाँ हैं
जोकि हर पल चीखते हैं
इतने कायर भी नहीं हम
मर तो जाएँ मुल्क पे कल
मौत के बाद सोचते हैं
और क्या रह जायेगा !
और क्या रह जायेगा ...
आग लगा दें ज़माने को
फिर सोचते हैं
क्या बचेगा कल जलाने को !
अब सोचते हैं राख नहीं
कोयला ही कर दें
काम आ जायेगी दुनिया
ठंडा चूल्हा जलाने को...