Sunday, 25 December 2011

और चंदा मुस्कुरा दी !... दूसरी मुलाक़ात में भी... :)

...और  चंदा  मुस्कुरा  दी  !



सुबह बस होने को थी...

चंदा के जाने का वक़्त था,

सारी रात चंदा के साथ थे, फिर भी वो बातें पूरी न हो सकीं जो आँखों से होती हैं ...

चंदा की अलसाई ऑंखें सिन्दूरी क्षितिज से ज़्यादा सुर्ख थीं...

और सारे चेहरे पे काले बाल फैले थे जैसे सुबह हवा में उड़ते काले पक्षियों की लम्बी कतारें...

हमने कहा- ए जी चंदा ! हमें अकेला छोड़ के मत जाओ !

दो तारे ही दे दो...

तुम्हारी याद में दिन कट जायेगा और रात में वो तारे फिर से तुम्हारे आँचल में पिरो देंगे !

चंदा बोली- मैं तो चली नहाने...


इस विशाल सागर के उस दूर छोर पे |

तारे कहाँ हैं ? सब चले गए...

इस किनारे की रेत उठा लो...

हम मायूस थे |

चंदा जा रही थी, उसका झिलमिल आँचल सागर में घुल रहा था |

हमने उगते सूरज की रोशनी से कहा हमें कुछ रेत उठाने दो !

पर ये क्या !

रेत में दो सफ़ेद फूल थे !!

ये कहाँ से आये !!!

ज़रूर ये तारे हैं जो चंदा ने छिपा दिए थे...

हमने चंदा को दूर उस पार जाते देखा और उन फूलों को चूम लिया |

चंदा की आँखों से आँखें मिलीं ...

और  चंदा  मुस्कुरा  दी  !

:)


-स्वरोचिष  "स्वतःवज्र"

...और चंदा मुस्कुरा दी !

...और  चंदा  मुस्कुरा  दी  !

असमान  में  थी  चंदा ,
हमें   देख  के   अनदेखा  कर  दिया ,
हमने  बुलाया  तो अनसुना  कर  दिया ,
स्याह  बादल  से  मुँह   ढक  लिया ,
हमने  कहा  हमारे  हिस्से  की  चाँदनी  तो  दे दो  ,
रात अभी  बाकी  है |

वो  गाल  का  काला  तिल  तो  दे दो ,
रात  अभी  बाकी  है |
चंदा  बोली -
क्यूँ  सताते  हो ,
इतने  दूर  हो  पास  भी  नहीं  आते  हो |
हमने  कहा  हमें  तो  बस
तुम्हें  देखना  होता  है ,
दर्द  तो  तब  होता  है  जब  अमावस  आ  जाती  है |

वैसे  आज  पूनम  है ,
और  रात  अभी  बाकी  है |
चंदा  मुस्कुरा  दी  !
:)
:)
:)

-स्वरोचिष  "स्वतःवज्र"

मैं स्वतःवज्र हूँ...

मैं स्वतःवज्र हूँ...

मैं  आग  हूँ ,
सीने  में  छुपा   हूँ ,
भड़कने  को  तैयार ,
रगों  में  बहते  खून  में  घुला  हूँ ,
उबलने  को  तैयार ,
मैं  आग  हूँ !

मैं  पानी  हूँ ,
आँखों  में  बहा  हूँ ,
भीषण  वर्षा  को  तैयार ,
करुणा  में  घुला  हूँ ,
प्रलय  लाने  को  तैयार ,
मैं  पानी  हूँ !

मैं  हवा  हूँ ,
अदम्य  तूफानों  में  उड़ा  हूँ ,
समूल  ध्वस्त  करने  को  तैयार ,
गर्म  साँसों  में  चला  हूँ ,
चक्रवातों  को  तैयार ,
मैं  हवा  हूँ !

मैं  आकाश  हूँ ,
निःशब्द शून्यता  में  रमा  हूँ ,
शस्त्र-संधारण  करने  को  तैयार,
रिक्तता  में  बसा  हूँ ,
योग  के  लिए  तैयार ,
मैं  आकाश  हूँ !

मैं  मिट्टी हूँ ,
पर्वतों  में  पिसा  हूँ ,
टूट  पड़ने  को  तैयार ,
माँसपेशियों  में  कड़ा  हूँ ,
अमोघ-प्रहार  करने  को  तैयार ,
मैं  मिट्टी  हूँ !

मैं  स्वर  हूँ ,
पाञ्चजन्य  से  निकला  हूँ ,
युद्ध  करने  को  तैयार ,
अर्जुन  के  कानों  में  पड़ा  हूँ ,
मृत्यु  वरने  को  तैयार ,
मैं  स्वर  हूँ !

मैं  विचार  हूँ ,
मस्तिष्क  में  कौंधा  हूँ - तड़ित सा ,
रणनीति  गढ़ने  को  तैयार ,
शत्रु-उर  में  भय  बन  धँसा  हूँ ,
विजय-श्री  करने  को  तैयार ,
मैं  विचार  हूँ !

मैं  स्वतःवज्र  हूँ ,
रण  में  पला  हूँ ,
जूझ  के  मरने  को  तैयार ,
अजेय  सूर्य  सा  बड़ा  हूँ ,
तुच्छ-तारों  कि  चमक  हरने  को  तैयार

मैं  स्वतःवज्र  हूँ !

मैं  स्वतःवज्र  हूँ !!

मैं  स्वतःवज्र  हूँ !!!


-स्वरोचिष  "स्वतःवज्र "
 

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