Friday, 24 May 2013

तीसरा जहाँ, नौवाँ पहर


मैं तेरी चाह में भटकता फिरा दोनों जहाँ
तू मेरी आस में तड़पती रही आठों पहर
मैं तीसरे जहाँ की आस में हूँ आज तलक
तू नवें पहर की चाह में है शाम सहर

ये ज़मी और चाँद रात भी मिले हैं कभी 
एक बार फिर से वो जुम्बिश है आजमाइश है
ऐसा भी कभी दुनिया में होता है कहीं !
ऐसा भी कभी दुनिया में होता तो नहीं !

ये अलग बात है तुम अब भी मुझमें शामिल हो
मगर रज़ा है के अब रुबरु हो हासिल हो
मुझे यकीं है हम मिलेंगे इस सफ़र में कहीं
जहाँ हो तीसरा या नौवाँ पहर ही सही

ये ज़मीं चाँद रात रुक के हमसे पूछेंगे
के कुछ अजब है इस जुम्बिश में आजमाइश में
ऐसा भी कभी दुनिया में होता है कहीं !
ऐसा भी कभी दुनिया में होता तो नहीं !

मैं ये कहूँगा ये ग़ज़लें है- जुम्बिशें इनकी
बतौर नज्मों के ये ज़ोर आजमाइश है
इन्ही ने तीसरा जहाँ नया बनाया है
इन्हीं की नौवें पहर की ये फरमाइश है

मेरी कलम भी तुम्हीं हो मेरा कलाम तुम्हीं 
इसी कलाम से तुम तक पहुँच की ख्वाहिश है
ऐसा भी कभी दुनिया में होता है कहीं !
ऐसा भी कभी दुनिया में होता तो नहीं !

#तुम्हारे लिए

गर मैं कुछ ऐसा कर पाऊँ



क्लाइमेट चेंज के मंच सजे 
हैं ग्रीन ग्रोथ के अधिवक्ता
हैं सावन के अंधे सारे
जिन्हें दीखे सब कुछ हरा-हरा

गाँवों के सूखे चेहरों की
कालिख अगर मिटा पाऊं
तो मानूँगा मैं भी कुछ हूँ
गर मैं कुछ ऐसा कर पाऊँ

वे छोटे लड़के गंदे से
दिन भर जो कचरा बिनते हैं
चौराहों पर फुटपाथों पर
फेंके हुए सिक्के गिनते हैं

उन कूड़े वाले हाथों में
गर कागज़ कलम थमा पाऊं
तो मानूँगा मैं भी कुछ हूँ
गर मैं कुछ ऐसा कर पाऊँ

मैं मुखर निडर आलोचक हूँ
सच कहने का दम भरता हूँ
वाणी से गरल उगलता हूँ
सच कहने से कब डरता हूँ !

गर खुद की निंदा के दो "स्वर"
बिन क्रोधित हुए पचा पाऊँ
तो मानूँगा मैं भी कुछ हूँ
गर मैं कुछ ऐसा कर पाऊँ

बेहतरीन बकवास


एक टूटते टूटते जुड़ जाती है
दूजी जुड़ते जुड़ते टूट जाती है

एक आस है
दूजी साँस है

दोनों मिलाके ज़िंदगी बनती है
जो बेहतरीन बकवास है ! 

 

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