Friday, 24 May 2013

गर मैं कुछ ऐसा कर पाऊँ



क्लाइमेट चेंज के मंच सजे 
हैं ग्रीन ग्रोथ के अधिवक्ता
हैं सावन के अंधे सारे
जिन्हें दीखे सब कुछ हरा-हरा

गाँवों के सूखे चेहरों की
कालिख अगर मिटा पाऊं
तो मानूँगा मैं भी कुछ हूँ
गर मैं कुछ ऐसा कर पाऊँ

वे छोटे लड़के गंदे से
दिन भर जो कचरा बिनते हैं
चौराहों पर फुटपाथों पर
फेंके हुए सिक्के गिनते हैं

उन कूड़े वाले हाथों में
गर कागज़ कलम थमा पाऊं
तो मानूँगा मैं भी कुछ हूँ
गर मैं कुछ ऐसा कर पाऊँ

मैं मुखर निडर आलोचक हूँ
सच कहने का दम भरता हूँ
वाणी से गरल उगलता हूँ
सच कहने से कब डरता हूँ !

गर खुद की निंदा के दो "स्वर"
बिन क्रोधित हुए पचा पाऊँ
तो मानूँगा मैं भी कुछ हूँ
गर मैं कुछ ऐसा कर पाऊँ

बेहतरीन बकवास


एक टूटते टूटते जुड़ जाती है
दूजी जुड़ते जुड़ते टूट जाती है

एक आस है
दूजी साँस है

दोनों मिलाके ज़िंदगी बनती है
जो बेहतरीन बकवास है ! 

शायर की शहादत

शायर को मरना होगा...

तोड़ के
चूरा करके
उस 
बेख़ौफ़
बेलौस
बेमुरव्वत
बदतमीज़ मगर सच्चे शायर को
खाद बनाई जाये 

कत्ले आम शायर का वक़्त की नज़ाकत है
नस्ल ए हिन्दुस्तान को खाद की ज़रूरत है !

शायर की शहादत से औज़ार रवाँ होता है
इन्कलाब होता है मुल्क़ जवाँ होता है !



 

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