Friday, 15 June 2012

बँटवारे


इंसानी फितरत ''बांटने'' की है | ऐसा लगता था पहले कभी कि मैं इस पहले से बँटी दुनिया में पैदा हुआ हूँ | अब महसूस होता है कि मैं खुद इस बँटवारे की वजह हूँ | बाँटना मेरी फितरत है, आदत है, मुसीबत है और इन सबसे ऊपर ज़रुरत है | ऐसा नहीं है कि बँटवारे border पर या भाई भाई के बीच ही हैं... बँटवारे और गहरे तक गड़े बैठे हैं...मेरे खुद के ज़हन में...|

रेलवे में नौकरी पाने के बाद देखा... कई departments हैं, कई services हैं - IRTS, IRPS, IRAS, IRPF, IRSE, IRSME, IRSS, IRSSE...

इसमें मुझे "I"  में Indian नहीं  "I" ही दिखा हरदम- "I" means मैं खुद!
"R" यानी Railway पे कभी ध्यान ही नहीं दिया मैंने...
मेरा सारा ज़ोर तो IR के बाद के दो हर्फ़ों पर है |

जो लोग पहले मेरे दोस्त हुआ करते थे, आज वो दूसरी services में हैं तो दोस्त कहाँ से हुए अब ?

मैंने ये नया बँटवारा खुद से खोजा है और पैने खंजर सा डाल रखा है अपने दिल और दिमाग में | थोड़ा दर्द तो है पर मुझे मज़ा आता है बँटवारे करने में |

जल्द ही मैं भी बँट जाऊँगा कई टुकड़ों में और बिखर जाऊँगा | मेरी ये फितरत ही मेरी किस्मत है | मैं खुद बँटवारा हूँ और टुकड़े- टुकड़े होता हुआ देख रहा हूँ खुद को...

Swarochish Somavanshi, ir"T"s

चाक पे

ये खुश्क रेत वक़्त की
फिसलती जाती है
मुट्ठियों से
रवायत है

आँखों से टप-टप गिरती
गीली यादें
वक़्त को बाँधे शायद
इनायत है

अब ये गीला लम्हा
दिन के घूमते
चाक पे है
क़यामत है

एक मूरत ढल जाये
गर साथ दो अपना तो
एक हाथ दो अपना तो...

रिलेटिविटी


रेल में    
खिड़की पे बैठ के 
हर दफ़ा महसूस  हुआ है...

जो मेरे ज़ियादा क़रीब है 
वो तेज़ी से दूर जा रहा है...


 

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