Tuesday, 3 January 2012
Monday, 2 January 2012
नाकामयाब काले पतले लड़के और मैं !
मैं कामयाब हूँ,
ऐसा सब कहते हैं,
मैंने भी मान लिया है कि-
मैं सचमुच कामयाब हूँ |
फुटपाथ पर रोजाना,
इक काला पतला लड़का कहता-
मैं बीमार हूँ !
मैं बीमार हूँ !
ऐसा बाकी सब भी कहते थे,
ऐसा बाकी सब भी कहते हैं,
लेकिन मैंने नहीं माना कि-
वो सचमुच बीमार है |
लड़का केवल
हरी लम्बी शर्ट पहनता था |
जो पहली और आखिरी नज़र में
काली ही दिखती थी |
अगर कोई उसे दो बार देख जाये तो !
अगर ये लड़का मर जाता तो,
शर्ट गरीबी से आज़ाद हो पाती !
गरीब लड़के झूठे होते हैं |
गरीबी झूठी होती है |
गरीबी गन्दी चीज़ है-
ऐसा सब कहते हैं,
मैंने भी मान लिया है कि-
गरीबी नाकामयाबी है |
फिर भी अपनी न सही-
उसकी कमतर हैसियत से,
और देखने वालों की-
निगाहों की गिनती कर के,
हर पखवाड़े एक रूपया दे दिया करता था-
उस काले पतले लड़के को |
और दसियों रुपये बचाते हुए,
इस तरह,
ये मेरी इक और कामयाबी थी |
मैंने मान लिया कि-
मैं सचमुच कामयाब हूँ |
बात अभी कल की ही है,
इसलिए गीली
और कुछ गर्म है ज़ेहन में,
बस इतना ही,
वरना इसकी कीमत
कुछ भी नहीं |
कल उस फुटपाथ पे जाना हुआ,
मेरी आँखें अनजाने में,
और कुछ जान बूझ के,
उस काले पतले लड़के को,
खोज रहीं थीं |
उस गरीब यानि नाकामयाब
और झूठे लड़के को-
क्योंकि मेरे कुर्ते की जेब में,
इक पुराना सिक्का था,
और मेरा मन हो रहा था-
खुद को कामयाब देखने का,
उस लड़के की-
गिचपिची आँखों में |
लड़का नहीं था !
वहाँ इक बुढ़िया बैठी थी |
मैं आराम से कह सकता था कि-
वो रो रही है,
अगर उसकी आँखों में-
आँसू होते
जो नहीं थे |
अगर उसकी आवाज़ में-
सिसकियाँ होतीं
सूखी सी-
जो नहीं थी |
फिर भी मैं कह सकता था कि-
वो रो रही थी |
पतले लड़के कि चीकट हरी कमीज़
और घिसा हुआ कटोरा वहीँ रखे थे |
लड़का गरीब न होता
तो मैं उसे सच्चा
मान भी सकता था |
वो मुझसे भीख न माँगता
तो मैं दुनिया का कहा
मान भी सकता था कि-
वो बीमार है,
जैसे कि मैं कामयाब हूँ !
बदन में हलकी सुरसुरी दौड़ पड़ी,
आज जाने क्यों पहली बार,
मुझे अपनी दुनियावी कामयाबी पे,
वो गुरूर नहीं हो रहा था |
क्या ये अफ़सोस था-
अपनी उन हरकतों पे,
जिन्हें मैं और दुनिया-
दोनों कामयाबी कहते थे,
और घर से निकलते वक़्त
जिसे मैं पहन लेता था
सूट के साथ |
मैंने आँसू की नमी
महसूस करनी चाही,
लेकिन सहसा मुस्कान उबल पड़ी
क्योंकि-
मेरा एक रुपया आज फिर बच गया था !!!
मैं फिर से खुश था
क्योंकि-
दुनिया ने कानों में सरगोशी से कहा-
तुम कामयाब हो गए!
और
मैंने भी मान लिया कि-
मैं सचमुच कामयाब हूँ |
"दो दिये और एक अँधेरा "
नए साल में इतना उजाला हुआ ,
मैंने अँधेरे से पूछा -
कहाँ जाओगे तुम अब ?!!
अँधेरे ने कहा -
चाहे जितने दिये जलें ,
चाहे जितने दीप उगें ,
हमेशा रहूँगा मैं -
हर दिये के नीचे ,
हर दिये के हिस्से कुछ काला अँधेरा है ,
हर दिया अँधेरा साथ लाता है !
अँधेरा खुश था ..
तभी मैंने दो दियों को -
आमने सामने रख दिया !
और दोनों दियों के नीचे ,
जगमग फ़ैल गयी ,
अँधेरा मर चुका था !
हर दिया अकेला है,
अँधेरे से लड़ने को |
साथ दो हो जाएँ तो -
कुछ और बात है |
-स्वरोचिष *स्वतःवज्र*
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