Sunday, 25 December 2011

"भ्रष्टाचारियों के प्रकार" -- स्वरोचिष "स्वतःवज्र "

भ्रष्टाचारियों के प्रकार-

पहले मैं "भ्रष्टाचार के प्रकार" शीर्षक से लिखना चाहता था क्योंकि तुकबंदी के लिहाज़ से यह बेहतर है लेकिन भ्रष्टाचार का आधार एवं स्रोत भ्रष्टाचारी-गण हैं, साथ ही इनका महत्त्व भ्रष्टाचार से अधिक है- जैसे की बौद्ध धर्म से अधिक महत्व महात्मा बुद्ध का है- शीर्षक बदल दिया है |
 आपने शायद कभी ध्यान दिया हो तो इस बात से सहमत होंगे कि भ्रष्टाचारियों के कई प्रकार होते हैं | भले ही सरकारी मशीनरी में सभी व्यक्ति भ्रष्ट न हों फिर भी इनकी संख्या मायने रखती है | विभिन्न प्रकार के भ्रष्टाचारी एवं उनके चरित्रगत गुण सोदाहरण निम्नवत हैं-
सक्रिय भ्रष्टाचारी- इस श्रेणी में वे लोग आते हैं जिनका व्यापार जग जाहिर है | अगर ये दस रुपये भी रिश्वत लेते हैं तो शाम के स्थानीय अखबार- जिन्हें शायद सम्पादक के अलावा कुछ कथित बुद्धिजीवी भी शाम कि चाय में घोल कर पीते हैं- में खबर 100 रुपये की छप जाती है | ये फिर भी सक्रिय रहते हैं | बेशर्मी से | बिना किसी हिचकिचाहट | उदाहरण- पुलिस विभाग के traffic के सिपाही का ट्रक वाले से 10 रुपये माँगना और न देने पर कम से कम 100 मीटर तक तो अवश्य भागना |
 अक्रिय भ्रष्टाचारी- ये शांत ज्वालामुखी हैं पर इन्हें सुषुप्त मानने कि कीमत महँगी पड़ सकती है | ये प्रायः सामने नहीं आते और कुछ विशेष दूतों- जिन्हें आम बोलचाल कि भाषा में 'दलाल' कहा जाता है और कभी कभी यह शब्द गाली के तौर पर भी प्रयोग किया जा सकता है- के माध्यम से स्व-धर्म का पालन करते हैं| इनके बारे में ज्यादा लिखा तो मेरा यह लेख कहीं नहीं छपेगा |
उदाहरण- सभी बड़े सरकारी अधिकारी जो भ्रष्टाचार को 'आम के अचार' के सामान स्वादिष्ट मानते हैं, और भ्रष्टाचार का चटपटा अचार बनाना जानते हैं, इसी वर्ग कि शोभा बढ़ाते हैं, जैसे उत्तर प्रदेश के कई पूर्व Chief Secretaries . अगर पाठक गण किसी नाम कि उम्मीद कर रहे हैं तो यह उनका "अखण्ड" दुर्भाग्य है और आपको केवल नेत्रों में "नीरा" ही प्राप्त होंगे | ;)
 संतोषी भ्रष्टाचारी- ये लोग "थोड़े से थोड़े ज़्यादा" में ही संतुष्ट जैसा कुछ रहते हैं| इनका सब कुछ सिस्टेमैटिक होता है | मतलब बंधी हुई इनकम !
उदाहरण- सरकारी अध्यापक विद्यालय के बाद, और अतिरिक्त फीस लेकर, अपना अमूल्य समय, उन्ही छात्रों के लिए दिन में दुबारा निकालकर, फिर से, अपने घर पर, सुरमयी शाम में,"कुछ नहीं " पढ़ाते हैं ! मगर बैच की संख्या, जो कि 60 के आस पास है, और घर के साइज़ के हिसाब से दस ज़्यादा है, से, और उससे आने वाली फीस से संतुष्ट रहते हैं| ये नए बैच में छात्रों की संख्या कभी नहीं बढ़ाते | हाँ, एक नया बैच शुरू करने और 60 छात्रों तक पहुंचकर फिर से संतुष्ट होने में इन्हें अतीव संतुष्टि मिलती है | कुल मिलाकर इन्हें संतुष्ट होने से कोई नहीं रोक सकता, जनलोकपाल और अमरीका भी नहीं |
 लालची भ्रष्टाचारी- ये "माँग और आपूर्ति", अंग्रेजी में भोकाल tight करने के लिए बोले तो "Demand and Supply" के सिद्धांत पर काम करते हैं | अगर माँग ज़्यादा है तो आपूर्ति कम कर देते हैं, और उसका उल्टा भी वैसे ही कर सकते हैं | इनकी माँग आपकी आपूर्ति की क्षमता पर निर्भर करती है| ये प्रायः अर्थशास्त्र के अच्छे जानकार होते हैं|
उदाहरण- सरकारी इंजिनियर- कमीशन की गणना में प्रखर बुद्धि ! काबिल गणितज्ञ !! जितनी लम्बी सड़क या पुल बननी है उतना ही लम्बा कमीशन, फिर हर चीज़ में अलग अलग कमीशन, सीमेंट और बालू में अलग, लोहे और मशीनों में अलग, यातायात और कर्मचारियों/ ठेकेदारों में अलग, सब कुछ अलग अलग और समय का फलन- अर्थात समय के आधार पर तय होने वाला....
अन्त में कमीशन इतना लम्बा हो जाता है की लोकार्पण के 23 घंटे बाद ही पुल "अलग-अलग" ! बिल्कुल भूमि के समान्तर अब आप इसे elevated road या चबूतरे की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं |
 धोखेबाज़ भ्रष्टाचारी- ये एक ही काम के लिए दोनों पार्टियों से पैसा खाकर गायब हो जाते हैं और शादी ब्याह की पार्टियों तक में नज़र नहीं आते हैं | संक्षेप में, मुद्रा भी ले लेते हैं और काम तो क्या "ठेंगा" भी नहीं होता !
उदाहरण- व्यक्तिगत नामों की सूची बहुत लम्बी है | सामूहिक रूप से "पुलिस भर्ती घोटाला काण्ड" जो कि सातों काण्डों से अधिक पुण्य देने वाला और व्यापक है, में लिप्त एवं निलंबित अधिकारी गण | वैसे अगर इन्होंने कुछ दलितों का पैसा खाने के बाद भी, उन्हें सिपाही बना दिया होता तो इनका क्या घट जाता? मगर महानुभावों ने "गाँधी-चित्र " तो सबसे धरवा लिया और selection किया "ऊपर" से आई लिस्ट के आधार पर ! तो फिर "दलितों की मसीहा" को तो यह कदम उठाना ही था, अब भुगतो...

अवसरवादी भ्रष्टाचारी- ये लोग आदमी की विपरीत परिस्थितियों एवं मुसीबतों को अवसर की तरह ग्रहण करते हैं | जितना मजबूर आदमी, उतनी लम्बी फीस|
उदाहरण-  कुछ सुयोग्य वकील | किसी परेशान आदमी को राहत देना कोई इनसे सीखे |अगर पूरे रंग में हो तो काले कौवे को भी फेल कर दें | कातिल को मुक़दमे से निकाल तो सकते ही हैं, victim के किसी रिश्तेदार को फंसा भी उतनी ही सफाई से सकते हैं | बस "तारीखों" के लफड़े में खर्चा पानी कुछ फ़ैल सकता है | जब ये मुकदमों के बोझ से कुछ हलके होते हैं तो मुँह में एक रुपये कि पुड़िया ठूँसकर, कचहरी के बाहर कल्लू की चाय की दूकान पर Indo- US Nuclear Deal पर लच्छेदार भाषण पीक रहे होते हैं | वैसे ये कभी कभी सक्रिय भी हो जाते हैं,समझ लीजिये मामला सचमुच सीरियस है | कचहरी गेट पर पाकिस्तान या चीन, अमरीका या अफगानिस्तान, लादेन या मायावती या फिर किसी जज का पुतला फूंककर राष्ट्रीय आन्दोलन की मशाल को जलाये रखते हैं और समय आने पर पुलिस के साथ मारपीट करने से भी पीछे नहीं हटते | आखिर पूरे सरकारी तंत्र में केवल यही बिरादरी, दरोगा से भी ऊंची आवाज़ में, और उसी के थाने के सामने, गालियाँ बककर सत्याग्रह करने की क्षमता और साहस रखती है | काले कोट को सलाम ! ईश्वर तेरी कालिमा बरकरार रखे !!
 डरपोक भ्रष्टाचारी- ये अंतर्मुखी भ्रष्टाचारी होते हैं | रिश्वत का रसगुल्ला मीठा तो बहुत लगता है पर मांगने में डर उससे भी ज्यादा लगता है | सबके सामने सिद्धांत और ईमानदारी के शास्त्रों की बाल्टियाँ भर-भर कर उल्टियाँ करते फिरते हैं लेकिन फाइल में हर बार चौदह ठो ऐतराज़ बताकर पेंडिंग कर देते हैं |
उदाहरण- बैंक मेनेजर प्रजाति के कुछ जीव | क्या आपने किसी बैंक से लोन लिया है? अगर नहीं तो आधी दुनियादारी तो आप स्किप कर ही गए समझिये | जब आप "Easy Loan" का विज्ञापन देखकर बिना तैयारी बैंक जायेंगे तो पहले डेढ़ घंटा तो यह पता करने में लग जाएगा कि मिश्रा जी इंचार्ज हैं या शुक्ला जी | शुक्ला जी से भेंट होगी तो शुरू होगा आवेदन पत्र एवं संलग्नकों को जमा करने का दुरूह कार्य | आपको आवेदन पत्र भरकर जमा करने को बुलाया जायेगा | साथ में एड्रेस प्रूफ, पहिचान पत्र आदि की फोटोकॉपी मांगी जाएगी | एक सौ पन्ने की प्रोजेक्ट रिपोर्ट और फ़र्ज़ी मानचित्र भी माँगा जायेगा | प्रोजेक्ट रिपोर्ट की खासियत यह है कि इसे बनाने वाले C.A. ने भी जब इसे नहीं पढ़ा तो कोई और क्यों इस पचड़े में पड़ेगा? इसलिए कवर पेज अंग्रेजी में विधिवत टाइप कराकर अंदर "मनोहर कहानियां" की दो किश्तें चिपका सकते हैं | लेखक इस बात कि गारंटी लेता है कि आपका लोन इस रिपोर्ट के content से नहीं बल्कि मेनेजर साहब के contentment से sanction होगा !
यह सब फ़ालतू बातें करने के बाद मेरा मन पूछे है कि भाया, सारी गलती है किसकी? ये भ्रष्टाचारी हैं किस ग्रह के प्राणी? अमंगल ग्रह या फिर zoo- पीटर के? दिखने में कैसे होते हैं ? मरे हुए गद्दाफी जैसे या जिंदा इरोम शर्मीला जैसे? क्या कहा !! normal होते हैं और इसी earth के वासी हैं बस अनर्थ के पोषक हैं सर्वथा समर्थ !! हम्म्म्म... बात कुछ कुछ घुस रही है भेजे में... कल्लू मामा के....
भ्रष्टाचार की doze बचपन से ही थोड़ी थोड़ी करके दी जाती है तब बनता है "लायक भ्रष्ट" | बचपन में एक चॉकलेट को अगर भाई के साथ बाँट के खाओ तो पापा मम्मी खुश होते है- देखो कितना ख़याल रख रहा है भाई का...यहाँ पे जड़ है भ्रष्टाचार के वटवृक्ष की | वही सदाचारी बड़ा होकर सरकारी ऑफिस में घुसता है तो उसी उसी सद्गुण, भाई/ भतीजों के साथ मिल बाँटकर गिफ्ट्स, ठेकों या टेंडरों के चॉकलेट को चबा जाने को, हमारे जैसे मूढ़ भ्रष्टाचार की संज्ञा दे डालते हैं, आदर्श के नाम पर और जलन के मारे ! बचपन में करो तो सदाचार बड़े हुए तो भ्रष्टाचार !!!
वस्तुतः सदाचार से भ्रष्टाचार तक का सफ़र smooth है | अंततः यह perception का विषय है | convenience का प्रश्न है | बकौल Einsteinफूफा, relative भी है | अगर आप मेज के "उस ओर" हैं और भ्रष्टाचारी आपकी पूँछ पर पैर रखकर आपको हलाल कर रहा है तो आप सदाचारी हैं, और जनलोकपाल आन्दोलन के घने सक्रिय Facebook एक्टिविस्ट बन सकते हैं | अगर आप मेज के "इस ओर" हैं और माल काट रहे है, चाँदी छान रहे है, सोने पे सो रहे है और सुखी हैं तो आप भैया भ्रष्टाचारी हैं, मस्त types | अब चूँकि हर आदमी कभी न कभी दोनों रोल प्ले करता है, हर आदमी, सदाचारी + भ्रष्टाचारी = सद-भ्रष्टाचारी है |
अब choice आपकी है | जैसे कि Morpheus चाचू ने भतीजे Neo को हरी और लाल गोली चमकाते हुए पूछा था, वैसे ही समय आप से पूछता है- मेज के किस तरफ अपनी बगिया ज्यादा सजाओगे सद-भ्रष्ट ? कुछ भी हो मेज के दोनों तरफ की दुनिया है बड़ी मनो-rum ! जय सद-भ्रष्ट !!
|| इति भ्रष्टपुराणं || ;)

 *** (अक्टूबर 2008 में हमने यह तक यह लेख लिखा था,उपसंहार का नरसंहार आज कर के facebook पे चिपका रहे हैं, कुछ मसाला भी घोल दिया है | हरि अनंत हरि कथा अनंता" की तर्ज पर, इस विषय का कोई अंत नहीं है, जैसे कि 2G,CWG, सुखराम जी, मायावती जी, चिदंबरम-मुखर्जी...| सर्व प्रिय जन-लोकपाल आन्दोलन के बाद यह लेख अधूरा सा है, लेकिन अधूरा ही ठीक है, वरना लम्बा हो जायेगा, जो कि अच्छी बात नहीं है| वैसे ही कोई पढ़ता नहीं यार... हेहेहे )
- स्वरोचिष "स्वतःवज्र " :)

हम रेल चलाते हैं...






हम "भारत की जीवन रेखा",
हमने पूरा भारत देखा,
हिम से सागर नित ले जाते,
हम फासले मिटाते हैं,
हम रेल चलाते हैं!




















घना कुहासा, या वर्षा रिमझिम,
सूरज तपता सूखा कण-तृण,
सूनामी हो या कठिन युद्ध,
हम अविरल सैर कराते हैं,
हम रेल चलाते हैं!
















वो छोटा सा एक किसान है,
ये उसका गेहूं धान है,
उन्नीस रुपये में गेहूं को,
बाज़ारों तक पहुँचाते हैं,
हम रेल चलाते हैं!











भारत की सेना परमवीर,
सीमा पर अविरत प्रबल-धीर,
हम उनको संबल देते हैं,
हम रोटी-गन पहुँचाते हैं,
हम रेल चलाते हैं!












वो श्रमजीवी वो मेहनतकश,
कुछ छोटे बर्तन गढ़ते हैं,
वो बर्तन दिल को छूते हैं,
हम उनके दिल तक जाते हैं,
हम रेल चलाते हैं!











बूढी माँ को और बाबा को,
तीरथ को जाना होता है,
चारों धामों की यात्रा को,
प्रति -पल सुगम बनाते हैं,
हम रेल चलाते हैं!





























 गोरी चमड़ी ने बाँट दिया,
कुछ सीमाओं में बाँध दिया,
"समझौता"और "मैत्री" से,
बिछड़ों को पास बुलाते हैं,
हम रेल चलाते हैं!














"विकसित-भारत" का स्वप्न प्रखर,
उद्योगों पर निर्भर करता,
उस अमित खनिज संपदा को,
उद्योगों से मिलवाते हैं,
हम रेल चलाते हैं!













यह मंत्री जी की नहीं रेल,
न अफसर-बाबू की है ये,
है 'गैंगमैन' और 'पोर्टर' की,
जो अपना खून जलाते हैं,
हम रेल चलाते हैं!
 
















हैं गहरे काले पन्ने भी,
इतिहास भी है कुछ मिला जुला,
इन स्याह अँधेरी गलियों में,
कुछ भूलों को दुहराते हैं,
हम रेल चलाते हैं!




















कुछ भ्रष्ट भी हैं ऐ "स्वतःवज्र",
मस्तक पर काले टीके से,
कलंक भी हैं पथभ्रष्ट भी हैं,
हम फिर क्यूँ उन्हें बचाते हैं!
हम रेल चलाते हैं!











हैं दुर्गम पर्वत आगे भी,
हम मानें हम सम्पूर्ण नहीं,
अपनी कमियों और भूलों को,
अन्तर्तम में झुठलाते हैं,
हम रेल चलाते हैं!











हम बनें नम्र, हो तंत्र सरल,
साहस-अदम्य, विश्वास-अटल,
ऊर्जा नयी, संचेतना-प्रबल,
ऐसी आशा के साथ सभी,
ये मिलकर शपथ उठाते हैं,
हम रेल चलाते हैं!
हम रेल चलाते हैं!!!























-स्वरोचिष "स्वतःवज्र"
:)

साढ़े नौ किलोमीटर का सफ़र- भारत और युवा के साथ!

साढ़े नौ किलोमीटर का सफ़र- भारत और युवा के साथ!

मैं भारत से मिला शाम का समय था | एक सुनसान रस्ते पर दोनों शांत खड़े थे- मैं
और भारत | दोनों को दूर तक जाना था- "विकास" तक | कोई गाड़ी न थी | विकास कई
किलोमीटर दूर था |

तभी एक बैलगाड़ी आती दिखी | दोनों बैठ लिए | चुप्पी | भारत का हुलिया मुझे
आकृष्ट कर रहा था | उसके पैर गरीबी और अशिक्षा के कीचड़ में सने थे | मैंने खुद
को सिकोड़ कर कीचड़ से बचाया | उसके कपडे साधारण थे- पुरानी जींस  और सस्ती टी
शर्ट, पर युवा आँखों में गज़ब की चमक थी | उसके सिर "कश्मीर" पर चोटें थीं मगर
वह ऊंचा था | जहाँ तहां नक्सलवाद की खरोंचों के बाद भी वह बाल-सुलभ मुस्कुरा
रहा था | मुझे आश्चर्य हुआ- सुखद आश्चर्य |

मैंने बातचीत शुरू की|
मैं- कैसे हो?
भारत- मस्त हूँ | एकदम रापचिक्क | बोले तो फुल्टू झक्कास |
मैं- इतराओ मत | हुँह...
भारत- Chillax (chill + relax)! आओ आज इस सफ़र में तुम्हे अपने दोस्तों से
मिलवा दूँ | लगभग हर एक किलोमीटर पर वो व्यक्ति हैं जिनसे मेरा सरोकार है |
सबसे वाकिफ हो लो |

पहला किलोमीटर आने को था | तभी भागता हुआ एक उचक्का- जो कि शक्ल से ही एहसान
फरामोश लगता था- भारत की तरफ लपका |

भारत- यह पकिया (पाकिस्तान) है | देखना कुछ मांगेगा | उसे हमारे मोहल्ले
एशिया के दादा ने भेजा है जो पीछे झाड़ी में अपने कुत्ते "ड्रैगन" के साथ खड़ा
है, लाल लुंगी में- चीनू दादा | अब देखो मेरी "diplomatic skills" |
पकिया-(करीब आकर बैलगाड़ी के साथ साथ दौड़ रहा है) - यार मुझे 500  करोड़ रुपये
दे दो, मुज़फ्फराबाद में भूकंप आया है | फ्लैश फ्लड भी आया है...लोग भूखे
हैं...
भारत- यह लो 300 करोड़ | इतने ही हैं मेरे पास | ...और थोडा सियाचिन पर बात
करनी थी अगर...
पकिया- अभी मैं थोडा बिज़ी हूँ | बाद में ... bye dear ...

(भारत झेंप गया | मैंने घूरना बंद कर दिया | ये थी भारत कि  "diplomatic
skills"!!! )

दूसरा किलोमीटर-
एक लड़का जो कि भारत का "युवा" था किनारे पुलिया पे कन्फ्यूज़ सा बैठा था |

भारत- क्या "युवा" ! कहाँ खोये हो?
युवा- गर्लफ्रेंड को आना था | अभी अभी she updated her status as "single"! यह
मेरा छठवां break -up है | nervous break down सा..| B.tech. सेकंड इयर में
हूँ | इंजीनियरिंग भी सांप-सीढ़ी कि तरह है |हर सेमेस्टर में साँप ही साँप हैं
| first innings में इण्डिया केवल 102 पे all out हो गयी | This life sucks as
hell ! साड्डा हक़ एथे रख | I'm going to join Anna Hazaare, thats it |

भारत ने उसे पुचकारते हुए कहा- यह मेरे गले में रत्नों कि माला है | इसका हर
पत्थर मेरा अनमोल रत्न है- यह गाँधी है, यह टैगोर, यह नेहरु, ये कलाम...तुम भी
ऐसे बनो
...एक अनमोल रत्न और जोड़ो न!

युवा- वो सब तो ठीक है, मगर semester exams और गर्लफ्रेंड का क्या करूँ?
भारत- बात में दम है बेटे लाल ! jus chill, manage them, make yourself strong
first, once you are strong , everything else follows ... tc chap ..
(युवा ध्यान से सुन रहा था जैसे सचमुच समझ रहा हो.. और मानने वाला हो...)
मैं- बिगाड़ ही दो इस लप्पू झन्ना को | टिका के देना था कान के नीचे |
तुम्हारे इसी लाड प्यार ने इसे अभिजित सावंत से राखी सावंत बना दिया है |
झेलोगे इसी तरह.. झेलू बेलन...
भारत- Take a chill pill dude !

तीसरा किलोमीटर-
मैंने भारत के गले में अनेकों सुनहरी और पुरानी मालाएं देखी | ये उसकी नदियाँ
थीं- शानदार पर मैली कुचैली | तभी Fun Republic Mall आ गया |
भारत- यह देखो मेरा दूसरा रूप- "India" जो कि कूल भी है- इसी में रमता है |
भोकाली है यह सब |
मैं- क्या भोकाली है? खट्टा रायता है | यहाँ recharge basis पे funहै, जितना
बड़ा recharge उतना ज्यादा fun ! recharge के लिए गाँधी चित्र चिपकाना पड़ता
है | यह Re.Pub.Lick तो है पर न तो democratic है न ही socialist ! अमीरों के
चोंचले...भाड़ में जाये नाग का fun और ऐसा republic , to the seventh hell !

भारत- तुम जैसे गरीबों के भी फायदे हैं इससे | इसके बाहर भीख तगड़ी मिलती है,
दबा के | इंजीनियरिंग कॉलेज के लड़के नैन मटक्का करते हैं, दबा के | centrally
a .c. ठंडा कर देता है आत्मा  के रोयें रोयें, दबा के!
मैं- ये मार भी डालेगा तुम्हे एक दिन "दबा के"!

चौथा किलोमीटर-
एक सजी धजी युवती कड़ी थी | समझते देर न लगी कि वो "वो" है |
मैं- यह "वो" ही है ना?
भारत-हाँ, वेश्या है, वैसे तुम्हे काफी पहचान है, पक्की नज़र है तुम्हारी...
मैं- (झेंपते हुए) अरे!!
भारत- ये वेश्या खादी की नगर-वधू यानि कि "पुलिस" है | यह राज्य सरकारों कि
रखैल है | वेश्या का अस्तित्व शाश्वत है | हर देश, काल और परिस्थिति में इसका
वजूद था, है और रहेगा | यह नीलकंठ शंकर का अवतार है, जोकि स्वयं विषपान करके
समाज को अमृत देती है | और पास में जो खड़ा है वो उसका मेनेजर है, खड़ी हिंदी
में बोलें तो दलाल | इसका नाम मीडिया है | यह cases देखता है | इन दोनों को
प्रणाम करो, अपना नम्बर मत दे देना जी | ( भारत ने चुटकी ली)
मैं- यह स्थिति दुखद है |
भारत- है तो | लेकिन क्या करें शाश्वत चिरंतन सत्य है | यहाँ वाला सत्य शिवम्
भी है और सुन्दरम भी, मगर केवल मरहूम राजकपूर जी के दृष्टिकोण से ही | बाकि
झोल है | तभी वहां पुलिस के दो कस्टमर भी दिखे- एक खादी में दूसरा बाबू टाइप !
जय हो शिव शंकर भोले नाथ की...


पाँचवाँ किलोमीटर-
रात घिर रही थी | खतरनाक इलाका था | बोर्ड दिखा- "नक्सलवाद नगर" की नरकपालिका
आपका ..... करती है | आइये तो बताएं आपको | अरे घुसिए तो सही |
मेरे रोंगटे खड़े हो गए | साँसें चलने सी लगीं और धडकनें रुक गयी | यह कोई पहले
प्यार का मीठा मीठा नशा नहीं था, मीठा दर्द भी नहीं था | घिग्घी बंध गयी |
संक्षेप में, हवा tight हो गयी | भारत ने AK 47 निकाली और साफ़ करने लगा | तभी सामने एक लंगड़ा दिखा |
भारत- यह किसान है | ज्यादा तवज्जो मत दो | कोई नहीं देता | यह मामूली आदमी है | हर साल इसके जैसे १७००० आत्महत्या करते हैं, कौन सा बड़ा तीर मार लेते हैं | इसके दो पैर थे, दो बैल भीथे | बैल मार गए, एक पैर यानि इसकी ज़मीन- कट गया- SEZ की बलिवेदी पे शहीद हो गया | नेता जी और कलेक्टर साहब कहते हैं इसे मुआवजा मिलेगा, जैसे गब्बर ने कहा था "सजा मिलेगी जरूर मिलेगी" | वैसे भी किसान लंगड़े ही ठीक लगते हैं | पेट्रोल पम्प का LICENSE मिलेगा इसे | खुशहाल होगा | बेटे के दोनों पैर अपने हाथ से काटेगा, देख लेना |

(भारत का गला रुंध गया | सिर जोकि कभी नहीं झुका था, अब झुक गया | मैं और भी डर गया क्योंकि अभी सुबह होने में टाइम था और भारत के हाथ गन से हटकर एक बिछड़े आंसू को छुपाने की कोशिश में लग गए थे |)


छठवाँ किलोमीटर-
रात का अंतिम पहर | सफ़ेद चांदनी में पुरजोर गीले तीन बुज़ुर्ग बुझी हुई आग को तापने का असफल प्रयास कर रहे थे |
भारत- ते तीन "बुद्धिमान बूढ़े" हैं, Three wise men of the East- संस्कृति, ज्ञान और चरित्र  | ये अब sidelined हैं | ये वक्त से पीछे रह गए | हम लोग Big Boss Season 5 में Sunny Leone तक पहुच गए | कारवां कब का निकल गया और ये भले आदमी गुबार ही देखते रहे ,बार बार लगातार ...
मैं-  इन्हें "विकास" तक ले चलें क्या? जगह है बैलगाड़ी में |
भारत- इनकी विकास में क्या ज़रूरत? GDP Growth rate और Per capita income में कभी संस्कृति, ज्ञान और चरित्र का ज़िक्र सुना है तुमने ? हमारे प्रधानमंत्री जब बोलते हैं तो, बकौल ओबामा, दुनिया सुनती है | और तुम तो निरे मूढ़ हो, तुम नहीं सुनते | सिविल सर्वेंट  हो क्या? मैंने हाँ में सिर हिलाना चाह पर शायद service rules याद आ गए | मैंने इग्नोर करने कि चाल चली और भारत को बुद्धू बना दिया, जैसे सब बनाते हैं | भारत बुद्धू बन गया | कभी बुद्ध हुआ करता था, आज मेरे सामने बुद्धू है भारत ! मेरी हंसी निकल पड़ी- हाहाहा बुद्धू भारत |

(अरे यह क्या! आश्चर्य!! यहाँ तो वो भी खड़ा है !!! "युवा" वही जो दूसरे किलोमीटर पर मिला था | संस्कृति, ज्ञान और चरित्र से बतिया रहा था | फिर उसने तीनों के पैर विनम्रतापूर्वक छुए और जाने लगा |
भारत का सिर गर्व से ऊंचा हो रहा था | मुझे भी फील गुड हुआ और निराशा का Ra.One , G.One के मधुर संगीत में तब्दील हो गया | ढिंका चिका..  ढिंका चिका..  ढिंका चिका .. ढिंका चिका .. हे हे हे हे ... 
सूरज चाचू जाग रहे थे  अब | यह एक नयी सुबह थी हम तीनों, युवा भारत और मेरे लिए )


सातवाँ  किलोमीटर-
भारत ने कहा यह haunted एरिया है- भूतों और चुड़ैलों का इलाका | शैतानी इलाका |यहाँ साम्प्रदायिकता नामक चुड़ैल है और अलगाववाद नामक भूत | 

मैं- साम्प्रदायिकता और अलगाववाद तुम्हारे पक्के दुश्मन हैं न?
भारत- हाँ हैं तो | लेकिन इलाज क्या है? AK 47 से कुछ नहीं होगा यहाँ |
मैं- तीन बुद्धिमान बूढों को बुलाओ न |
भारत- वो हार चुके हैं |
मैं- तो अब क्या होगा? कौन इसे ठीक करेगा? जनलोकपाल ?
(मेरे PJ पर भारत हंसा नहीं, मुझे एक कन्टाप मारा धर के)
भारत- केवल युवा ही कुछ कर सकता है | लेकिन वो तो इंजीनियरिंग, गर्लफ्रेंड, facebook , night लाइफ और क्रिकेट में फँसा है | बेचारा... lets see what happens...
(मेरा गाल कन्टाप से झन्ना गया | नरेगा में काम कर कर के और उस से भी ज्यादा आराम कर कर के भारत के हाथ मज़बूत हो गए थे | उसका रहपटा  खा के मैं छटपटा गया )


आठवां  किलोमीटर-
यहाँ से गाँव का गन्दा नमकीन महासागर ख़त्म होता था और शहर का मीठा झरना शुरू |
भारत ने झटपट रूप बदल लिया- Armani की jeans- Dakota fitting extra low waist, sleeveless T shirt और भोकाली goggles! खटाके से N-8 निकाला और fb पे अपना status  update  किया | मैंने मन में सोचा- स्लीव लेस शर्ट पेहेन लेने से आस्तीन के साँप थोड़े ही मर जाते हैं, हुँह.....
भारत (चहकते हुए)- यहाँ से मुझे इंडिया बुलाना | भारत is just middle class, down market and very LS (Low Society).
मैं- OK Boss :)

(तभी एक विदेशी सौदागर जोकि भारत का पुराना हाकिम हुआ करता था, पास आकर बोला )
फिरंगी सौदागर- यह लो इंडिया, तुम्हारा माल आ गया है | यह तलवार- "G- Sword", मतलब globalisation की तलवार और FDI का एक बड़ा बोरा |
मैं- यह क्या है भारत?... i mean India...
भारत- यह  तलवार दुधारी है | इसका नाम globalisation | एक धार है World Bank दूसरी WTO ! इससे गरीबी और बेरोजगारी का शिकार करूँगा | G-Sword Roxxxx beta....
मैं- बचा के | देख के | अपने हाथ मत काट लेना | इसकी धार बड़ी पैनी है और बेचने वाले को देखो उसे बड़ी बेचैनी है | यह फिरंगी सौदागर है, trust him but verify too!... जैसा कि प्रधानमंत्री जी कहे रहेन...|
भारत ने तवज्जो नहीं दी और Kill Bill की Uma Thurman की भांति तलवार को निहारने लगा |  globalisation की चाट है ही ऐसी- I'm lovin' it! muah, muah, muah...


नौवां  किलोमीटर-
भारत- यहाँ से मेट्रो ले लेते हैं | बैलगाड़ी का jurisdiction ख़त्म |
(दोनों मेट्रो पर लद गए | धाँसू सा लगा | भारत शो ऑफ कर रहा था, मेट्रो का,  G- Sword का, FDI का भी)
 वहां सामने की सीट पर "चार Gentlemen" दिखे | चार महामानव | भारत चहकते हुए बोला ये विकास की और ले जाने वाले चार Gentlemen हैं | मुझे इन पर पूरा भरोसा है, ये हैं- IT, Bio Tech, Space Tech and Manufacturing.
मैं- ह्म्म्मम्म... मगर SEZ वाले इलाके में ये कुछ कर पायेंगे? वहां का माहौल अफगानिस्तान को टक्कर दे रहा है |
भारत- तुम्हारी बात में दम है | पहली बार टाइम पे सही बात के लिए मुंह खोल्यो राजा बाबू | मैं इन्हें G- Sword और FDI  का  बोरा दे दूंगा | Now relax dude!
(एक चम्मच यथार्थ को एक गिलास साँत्वना के साथ गटक लिया मैंने | मूड ठीक सा होने लगा, मैं कोलावेरी कोलावेरी गुनगुनाने लगा...)

चार महामानव अचानक ही मेट्रो से उतरने लगे | ये central secretariat  मेट्रो स्टेशन था | भारत उन्हें सामान देने को लपका | मैंने follow किया |
(विकास तक जल्दी पहुचने कि लालसा में भारत भागने लगा | सीढियां उतरने लगा बेतहाशा...)
मैं- भारत संभाल के...आगे रिसेशन/ आर्थिक मंदी कि ग्रीज़ फ़ैली है |
भारत- मुझे 'विकास' तक पहुचना है, मंदी गयी तेल लेने |
(तभी धडाम !!! यह क्या ! क्या हुआ यह ! भारत विकास कि चाह में बेतहाशा लुढका जा रहा था- कई सीढियां- human rights , नैतिकता, उदात्त आदर्श, सद्भावना व करूणा कि सीढियां, एक एक करके...विकास कि अंधी दौड़ में... और कुछ ही देर में भारत मंहगाई और बे-रोजगारी कि कठोर ज़मीन पर आ गिरा ! चोटिल | एक हाथ में FDI का बोरा और दूसरे में globalisation की तलवार, सब बेकार...  )

(मैंने उसे उठाना चाहा | चारों महामानवों ने हाथ लगाया | अफ़सोस भारत को चार कन्धों का सहारा लेना पड़ रहा था आज | उपमा अलंकार के इशारे मात्र से ही मेरा अंतर्मन काँप उठा | 
अब भारत पहले हॉस्पिटल जायेगा | बाद में विकास कि खोज करेगा | सब कुछ टल गया था |
तभी युवा भागते हुए आता दिखा | साथ में डॉक्टर था |)

युवा- मैंने भारत को गिरते देख लिया था | डॉक्टर पकड़ लाया हूँ | पेन किलर और युवा के चेहरे के असर  के कारण भारत फिर से खड़ा हो गया | चारों महामानवों को 'माल' थमा दिया |

युवा- भारत तुम जाओगे विकास तक | मैंने अपने issues sort out कर लिए हैं, I will manage them well in future too ... मैं ले जाऊँगा तुम्हे |
(भारत के मन कि असीम शांति और चेहरे कि चमक आसानी से पढ़ी जा सकती थी )

 भारत युवा से कहता है- मैं और तुम एक ही हैं !
युवा- हाँ हम दोनों तो एक ही हैं | तुम्हारा यह सिर कश्मीर मेरी भी शान है | तुम्हारी दोनों आस्तीनों में दो काले साँप- पकिया और चीनू दादा- मेरे लिए भी ज़हर हैं | तुम्हारी इन नदियों में बहता पानी मेरी रगों में बहता खून है | सच में मैं ही भारत हूँ, I am INDIA!

 (अब भारत को कोई चिंता नहीं थी क्योंकि संस्कृति, ज्ञान और चरित्र  तीनों बुद्धिमान बूढों की परंपरा को युवा ने हिम्मत के साथ स्वीकार कर लिया था | अब भारत के लिए रास्ता केवल कठिन था, असंभव नहीं! मेरी राह भी आसन हो गयी थी | विकास हम आ रहे हैं, अपनी गौरवशाली परंपरा के साथ...
मैं देख रहा था, भारत मुस्कुरा रहा था और युवा मन ही मन बार बार दुहरा रहा था-
"I am INDIA!, I am INDIA!, I am INDIA!.....")

- स्वरोचिष "स्वतःवज्र " :)
 

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