Tuesday, 30 July 2013

जाये जवान !



(1)

मकर सक्रान्ति का दिन था खिचड़ी मनाई जा रही थी।बच्चे रंगीन पतंगों में मगन थे मगर सूबेदार भगवान सिंह के घर की रौनक और ही थी। सूबेदार साहब पूरे छह महीने बाद घर आ रहे थे आँगन में आकर जैसे ही उन्होने अपना भारी सा सन्दूक ’’धम्म से" पटका, सब जान गये कि सूबेदार साहब आ गये हैं । उनके तीनो बच्चे आँगन की तरफ लपके। नाहर, जो सबसे बडा था जो बी0ए0 फाईनल में था, चंचल के साथ चारपाई बुन रहा था। पुरानी बुनाई जगह-जगह से टूट गई थी। चंचल बारहवीं में थी, दोनो बडे शान्त और शालीन थे, शैतान तो छोटू था जो आठवीं में था लेकिन जबान कतरनी कैंची की सी और दिमागी रफ़्तार घोड़े से भी तेज़।

          जहाँ एक तरफ बच्चे सूबेदार साहब से लिपट गये वहीं सूबेदार की पत्नी रसोई से भागकर अन्दर चली गई और खिड़की की आड से देखने लगीं, देखने लगीं कि सूबेदार साहब कितने दुबले हो गये है, चेहरा निकल सा आया है, रंग भी कितना दब गया है। इन सब सवालों के बावजूद उनका मन पुलकित होता रहा । उन्हें इसकी याद भी न रही कि रसोई में कढाई में बेसन के सेंव तल-तल के जल रहे है।

          बच्चो से मिलकर सूबेदार साहब देहरी के अन्दर आने लगे और हमेशा की तरह उनका सिर ’’खट’’ से चौखट से टकरा गया। वह लम्बे थे, चौखट नीची थी, टक्कर होती रहती थी सावित्री की हँसी निकल गई। सावित्री-हाँ सावित्री ही तो नाम था उनका। अपने नाम के अनुरूप ही अपने अस्तित्व का  समर्पण कर दिया था सावित्री ने। अब सब उसे ’’नाहर की अम्मा’’ के नाम से पुकारते थे। सूबेदार साहब सिर मलते रहे सावित्री हँसती रही-हँसी रोकती रही-हँसती रही। असल में सावित्री को शादी के बाद का पहला दिन याद आ गया जब उनकी सास आरती उतार रही थी और गृह प्रवेश के समय सूबेदार साहब का सिर टनटना उठा था तब भी उनकी हँसी न रुकी थी और पाँच गाँव तक की औरतों ने कितनी बातें बनाई थी कि ’’नईकी बहू दाँत निपोरत है...मरद की खिल्ली उडावे है...।

उसके बाद से जब जब सूबेदार साहब का सिर का सिर टनटनाया सावित्री हँसी और इतनी हँसी कि मुहल्ला इकट्ठा हो गया- पड़ोस की मौसी, बिसेसर काका और पन्सारी की दुकान के सामने कंचे खेलते सब बच्चे-हँसते थे। सूबेदार साहब शरमा जाते थे क्योंकि सभी को शादी के बाद के पहले गृह प्रवेश की घटना पता थी और बार नई तरह से मौसी कंचे खेलने वाले बच्चों को सुनासुना कर हँसती जाती थीं और कहानी अगली पीढी तक श्रुति के रुप में फैलती जा रही थी । 

“कित्ते करिया हो गये हो नाहर के बाबू, फौज में कोयला देत हैं का खावै के ?” कहकर सावित्री देवी फिर से हँसने लगी। इस बार सूबेदार साहब भी हँसे और तीनों बच्चे भी। हँसी का सिलसिला रुका । सूबेदार साहब चुप हो गये और सावित्री देवी की आँखों में देखकर, आँखो ही आँखो में बोले-सावित्री ही निकली तुम, तुमने सब संभाल लिया, मुझे पता था कि तुम कर लोगी। सावित्री देवी ने सब सुन लिया, उनकी आँखे भर आई और सूबेदार साहब-जोकि काफी रोबदार और मजबूत दिल के आदमी थे- भावुक हो गये, चार बूँदें धरती पर गिरीं  और मौन में ही सारी बात हो गयी। महीनों सालों की सारी बातें हो चुकी थीं ।  आज सूबेदार साहब के घर में भी त्यौहार था। 

(2)

शाम को घर के सारे लोग आँगन में इकट्ठे थे, बतिया रहे थे । इतने दिन बाद पूरा परिवार साथ जो बैठा था। सूबेदार साहब, नाहर और चंचल से उनकी पढाई लिखाई के बारे में पूछ रहे थे और छोटू बन्टी के साथ कूदता फिर रहा था। 
नाहर ! बेटा इस बार सीडीएस का फारम भरोगे न?  कस के पढो ! लेफ्टिनेंट लेफ्टिनेंट होता है एसपी, डीएम की तरह नेताओं के पैर पकड़ता नहीं फिरता। अपनी कम्पनी में जीता है, अपनी कम्पनी में मरता है, बापू कहते थे कि नौकरी करो तो फौज की- नहीं तो मत करो बे-मौज की, पहले विश्वयुद्ध में लड़के आए थे ! शेर का जिगर था ! तीन-तीन पहलवानों को हवा कर देते थे अखाड़े में, पूरे "सिंह" थे फौजदार सिंह । हमारे नाहर सिंहभी मेंजर बनेंगे एक दिन ! एकदम मेजर प्रदीप की तरह जानते हो उनके बारे में ? हमारे मेजर साहब है, शान्त व निडर; उसूल के पक्के और काम में होशियार । वो भी तीसरी पीढ़ी के आर्मी मैन होगें। 

यह कहकर सूबेदार साहब ने नाहर को गर्व से देखा। नाहर था भी गर्व करने लायक । लम्बा-चौड़ा, पढाई में होशियार और इलाके भर में सबसे बढ़िया एथलीट। नाहर की गिनती गाँव के सबसे होशियारलड़कों में होती थी, उसका कारण था पिता का उत्साहवर्धन और माँ सावित्री का लालन। सावित्री ने किया ही क्या था अपने लिये, बस बच्चो को पढ़ाती गयी, उनकी देखरेख करती गई, नाहर को भी नहीं पता चला कब पिता का सपना उसका अपना सपना बन गया, वह दिन रात फौज के सपने देखा करता था। दादा के विश्वयुद्ध के मेडल को छुआ और महसूस किया करता था।

तभी सूबेदार साहब ने चंचल से पूछा-तुम क्या बनोगी बिटिया ? मै आर्मी में डॉक्टर बनूँगी कहते ही चंचल की आँखो में चमक आ गई, पूरा घर फौज के रंग में रंगा था। अरे नाहर ! ये छोटुआ कहा है ? ये पढ़ता वढ़ता भी है या...
        नाहर बोला बाबू इसका मन पढ़ाई में बिल्कुल नहीं लगता, बस निखट्टू बिट्टू की पूँछ बना फिरता है । पूरा मुहल्ला, गाँव एक किये हैं दोनों, पूरा दिन महाभारत!!!- कहते हुए नाहर का गुस्सा फूटा ।  

-ये बिट्टू किसका लड़का है ? कहते हुए सूबेदार साहब ने चाय की चुस्की ली।
-बिट्टू राधे चचा का लड़का है, 
-कौन राधेश्याम ? वही जो पुलिस में हवलदार है न ? 
-हाँ वही । 
-उनकी तैनाती चुंगी पर है न... तो रोज कुछ न कुछ खरीद लाते है बिट्टू के लिये ...ये छोटुआ उसी लालच में चिपका रहता है। चुंगी और ट्रान्सपोर्ट थाने में अच्छी कमाई है सुनते हैं ! 

सुनते ही सूबेदार साहब गरज उठे- यह सब बकवास है। दो नम्बर का पैसा केवल दस वर्ष तक टिकता है ग्यारहवें वर्ष मूल ब्याज सब नष्ट हो जाता है। राधे पगला गया है कोठी ठोक कर बारात घर खोलेगा क्या ? घोर कलयुग ? छोटुआ को बुलाओ ...अभी बताते हैं। 

अदालत लगी छोटू जी पेश हुए। बिट्टू बाहर से दिवार पर लदा हुआ अदालती कार्यवाही देख रहा था सूबेदार साहब ने दृढता से पूछा 
-तुम्हारा मन पढ़ने में नहीं लगता न ? 
छोटू चुप।
-बोलो
लगता तो है ...भइया  ने शिकायत की है क्या ? 
-नहीं भइया  ने नहीं ...पूरे गाँव ने की है छोटे ठाकुर साहब ...आप बहुत उड़ रहे है पढ़ लीजिए वरना यहीं गोबर काढेंगे। 
          ’’पढ़ लीजिए वरना यहीं गोबर काढेंगे...’’ यह वाक्य दरअसल सूबेदार साहब के पिता जी का था जो उन्हे इसी तरह डांटा करते थे। डांट का अच्छा असर भी हुआ था। सूबेदार साहब इण्टर दूसरी श्रेणी में पास हुए और बीए0 प्रथम वर्ष में थे जब फौज में भरती हुये। वह हिन्दी निबन्ध में बहुत अच्छे थे, साहित्य के पक्के प्रेमी, लगभग पूरा हिन्दी साहित्य पढ चुके थे और फौज में भी बिना कुछ पढ़े सोते न थे। 

-बड़े हो गये है आप अब। भइया नाहर लैफ्टिनैन्ट बनेगा, दीदी फौज में डॉक्टर, आपके नेक इरादे क्या हैं महाशय?
-’’मै नेता बनूँगा" सहसा छोटुआ मुहँ से निकल गया। यह सुनते ही गम्भीर माहौल में हँसी तैर गयी। सब हँसने लगे दीवार पर लदे बिट्टू की हँसी निकल गई तो सूबेदार साहब भी हँस पड़े 
क्यूँ भाई नेता क्यूँ बनोगे?हँसी रोकते हुए उन्होंने पूछा। 

-ताकि आपकी पोस्टिंग चुंगी थाने पर और बिट्टू के पापा की पुंछ में करवा दूँ।
सूबेदार साहब की त्यौरियाँ  चढ़ गयीं। 
छोटुआ फिर बोला मासूमियता से- गुस्सा क्यो हो रहे हैं। उनके पापा कितने खिलौने, साईकिल लाते है उसी थाने के पैसे से, और एक हम हैं कितने दिन हो गए नये कपड़े पहने। ये रसोई का छप्पर बहुत पुराना हो गया है धुएं के कारण कोयला जैसा लगने लगा है। अम्मा खाँस खाँस के दम नहीं लेती। 
और तो और बिट्टू और उसके भइया को कोई हाथ लगाके तो दिखाए !

सूबेदार साहब क्रोधित होते होते सभले। एक मिनट ... तुझे किसने हाथ लगाया ? 
छोटू गुस्से से बोला अमीर सिहं ने ...आप तो रहते नहीं यहाँ ...वो अमीर सिहं बहुत बदतमीजी करता है ...एक दिन दीदी को कुछ कह रहा था तो भइया  ने उसे बहुत धुना ...बाद में काफी हाथापाई हुयी ...भइया को काफी चोट आई ...केवल बिट्टू के पापा काम आए। अपनी बुलेट लाके खड़ा कर दिए बाहर और बोले ये पुलिस का घर है फौजी का समझ कर अनाथ न मानो ...
और तो और नहर का पानी और बगीचे वाली जमीन भी दबा रहे है वो लोग 
यह सब सुनकर सूबेदार साहब नाहर की तरफ देखने लगे।

 ये सब क्या है ? अमीर सिहं कौन है कुंवर सिंह का पगलेट बिटवा तो नहीं है ? इतना बडा हो गया है कि हमें धौंस देता है और नहर का पानी भी काट लिया क्या ? तुम चिट्ठी में कुछ लिखते क्यो नहीं ? 
नाहर बोला- हम सोचे आपको क्या परेशान करें, खुद ही सभांल लेंगे। आप वहां से कर भी क्या पाएंगे- उत्ती दूर से ? वैसे हम आपको बताने वाले थे आज रात- तलाब के पीछे और बगीचे के बीच की जमीन कब्जा लिए है कॅुवर चाचा खलिहान बनाने के बहाने और अब दीवार उठा रहे हैं, और तो और पूरा पानी उतार लेते है नहर का। यादव लेखपाल उनका आदमी है, कानूनगो कोई सक्सेना है बडा लुन्ज आदमी है। हजार डरपोक मरे तो ये सक्सेना जना । 

सूबेदार साहब गम्भीर मुद्रा में आ गये-हम्म्म! कल देखते है अमीर सिहं कुँवर सिंह को! बिच्छू का मन्तर पता नहीं और साँप के बिल में हाथ डालने चले हैं, 150 जावानो को आदेश देता हूँ रोज़, मजाक है क्या ! लेखपाल कानून से बाहर तो नहीं। मुझे जानता नहीं होगा, कल मिल के आता हूँ उससे भी।

छोटू उस्ताद ने आज फिर बात को दूसरी तरफ मोड़ कर खुद को बचा लिया था लेकिन इस बार बात असली समस्या की तरफ मुड़ी थी । सावित्री देवी चाय का प्याला लेकर जब तक आयीं सूबेदार साहब चिंतामग्न हो चुके थे और क्षितिज में निहार रहे थे। आज फिर सावित्री अपनी बात नहीं कह पाई, अपनी समस्या बताने आई थी, सोचती थी सब हँस बोल रहे है वो अपनी बात रखे, उसकी दमे की शिकायत बढ़ गई थी, आँखो से पानी गिरता था और घुटने पकड़ने, लगे थे शायद  गठिया हो रहा था। 
          मगर आज भी सूबेदार साहब दूसरी अधिक गम्भीर समस्याओं में उलझे थे, सावित्री चुप ही रही पास आकर बैठ गई। उनका हाथ सहलाने लगी और बोली लाओ तेल लगा दें सिर में, बाल बहुत रुखे हो रहे है, फौज में मिट्टी का तेल लगाते है का सब लोग ? 
सावित्री के इस सायस हास्य का सूबेदार साहब पर कोई फ़र्क नहीं पड़ा। बुत बने रहे और क्षितिज के सूरज का तेजी से बदलता रंग घूरते रहे।

  (3)        

अगली सुबह तहसील कचहरी, ठीक ठाक भीड़ इतनी भीड़ जिसमें काम का आदमी खो जाये। मगर इतनी भी नहीं जितनी गाँव के मेले में होती है, चारों तरफ गुमटियाँ सी बनी हैं जिसमें स्टाम्प बेचने वाले बेठे हैं- पान की दुकानों की तरह। एक दूूसरी ओर बड़े से नीम के पेड़ के नीचे टीनशेड से छाये हुए वकील बाबुओं के बस्ते हैं। नीम के ऊपर काले कौओं की खासी भीड़ है नीचे काले कोट वालों की उससे भी ज्यादा। इसी परिसर में कलेक्ट्रेट भी है यादव लेखपाल भी यही बैठते हैं। सूबेदार साहब नाहर के साथ लेखपाल के दफ्तर पहुँचते है और अन्दर घुसते हैं।

-आप अन्दर कैसे आ गए ...अभी जो है कि लंच टैम है आप बाहर बैठिए...जो है कि...सूबेदार साहब ने घड़ी देखी कि लंच तो आधे घण्टे पहले  ही खत्म हो चुका है आप लंच कर भी तो नहीं रहे हो आप मेरी बात ही सुन लीजिए।
          इस पर वहाॅ बैठे सभी सरकारी लोगों ने आगंतुक को निगाह भरकर देखा और बेपरवाह फिर से अपने काम में लग गये सूबेदार साहब ने भी उन्हे देेखा चाय, समोसे खाये जा चुके थे चौराहे पर चाय की दुकान चलाने वाला बारह साल का लड़का जूठा उठा रहा था। एक चेला गंगाराम, यादव लेखपाल के लिये खैनी बना रहा था बाकी सरकारी लोग कल के प्रदर्शन और चक्काजाम पर बहस कर रहे थे। लेखपाल जी ने उन्हे ध्यान से देखा, फिर चेले गंगाराम से बोले-

-गंगा हो! जाफरानी लाया करो। ससुर बिफ्फे को काँटा जइसा खैनी खिलाया। सूल उठता है ...जो है कि ...लेखपाल का बस्ता उठाना सबकै बस की बात नै है...जो है कि...। 
-मुन्ना पान वाले की थी। मुन्ना बोला रहा लालगंज की सबसे टाप खैनी है तो हम ले लिये। मुन्ना ठगता है। लेखपाल जी बुदबुदाये। दुलहिन वही जो पिया मन भाए, सुरती वही ...जो है कि ...फुर्ती लाये। इस साले मुन्ना के का पता सुरती वुरती। ठगता है ...जो है कि ...

सूबेदार साहब आश्चर्यचकित खड़े रहे- यह सोचकर कि क्या वह अदृश्य हैं जो दफ्तर के किसी आदमी को  वह दिखाई नहीं दे रहे। 
लेखपाल जी ! हम खडे है यहाँ। 
तो क्या करें ? खड़े रहिये, अभी लन्च टैम है, सूरती खा रहे हैं, इसके बाद कुल्ला करेंगे फिर एक चाय और पियेंगे। बाहर जाकर बैठिये बाहर पूरा शिव बारात बैठा है। सबको साला हमसे ही मिलना है ...जो है कि ...हमीं कलट्टर हैं का हो गंगा ? 

जी चार गाॅव के लिए आप ही निसपिट्टर है आप ही कलट्टर ...आप ही गवर्नर हुजूर। 
और दाॅत निपोर देता है गंगा चापलूसी में। इस झूठी चापलूसी पर दफ्तर के सभी लोग हँसे।
अब आप बाहर जाएँ महाराज आप।  नम्बर लगे तो आईयेगा।  यहाॅ सब काम नम्बर से होता है। सब कायदे से होता है ...जो है कि ...लन्च टैम में भी चिक चिक चिक चिक... लेखपाल जी बुदबुदाते हुए गंगा के हाथ से सुरती लेने लगे। 

सूबेदार साहब बाहर आकर बैठ गये। लगभग दो घण्टे तक लेखपाल जी यहाँ वहाँ करते रहे। कभी इस वकील के पास बैठते तो कभी उस वकील के पास। कभी नोटरी को कुछ समझाते हुुये चाय पीते रहते तो कभी फोन पर लगे रहते। चार बजे तक केवल तीन चार लोग ही मिल पाए उनसे। अगर ऐसा ही चला तो नंबर कैसे लगेगा आज? 
तभी गंगा दांत निपोरता हुआ आया और सूबेदार साहब के बगल बैठकर एक पैर ऊपर उठाकर चबूतरे पर रख लिया।

-आपको को मिलवाये देते है लेखपाल जी से। हम उन्हीं के आदमी है- गंगा! पूरा कचहरी जानता है 

लीखपाल जी बस्ता उठाना हँसी ठठ्ठा नहीं! 
गंगा नहीं तो जरीब-लठ्ठा नहीं!! 

पचास ठो रुपया दीजियेगा।सुरती लायेंगे। आप भी लीजियेगा क्या ?
- पचास रुपये किस लिये ? 
-फीस लगता है। कोरट फीस, दरबारी कुच्छो कह लीजिये बाबू जी। बिना फीस के कैसे मिलियेगा ? सरकारी काम है- सरकारी टैम कीमती होता है। 
-नहीं देता। पचास रुपये क्या एक रुपया भी नहीं देता। जा कह दे अपने लेखपाल साहब से कि मैं इस घूसखोरी की शिकायत करने तहसीलदार साहब के पास जा रहा हूँ। फ़ौज में सूबेदार हूँ। जा बता दे।

यह सुनकर गंगाराम का मुँह उतर गया और दाँत अन्दर हो गये। वह चुपचाप भयभीत सा- लेखपाल के कान में कुछ कहता है। लेखपाल जी कुछ समझाते हैं। गंगा लौट के सूबेदार साहब से कहता है
- मेजर साहब आपको लेखपाल साहब ने बुलाया है। आपका नम्बर आय गवा। 
सूबेदार साहब को एक बार फिर अपनी कम्पनी पर, मेजर नवलगुण्ड पर, अपने पिता पर और समूची फौज पर गर्व होता है। आत्मविश्वास वापस आता प्रतीत होता है। वह नाहर को गर्व से देखते हैं। मानो कह रहे हों- देखा! 
तो आपकी जमीन पर कब्जा हो रहा है। बाँस गाँव में। आपका चचेरा भाई कुँवर सिहं ? ह्म्म्म । देखिये आप दरख्वास्त दे दीजिए ...जो है कि। तहसील दिवस को आइयेगा। तहसीलदार साहब, कानूनगो साहब सब लोग होगा। जमीन कौन सी भागी जा रही है जो है कि...

-मगर मेंरी छुट्टी तो केवल तीन दिन बची है। तहसील दिवस को तो अभी पूरा हफ्ता है। आप कल मौका देख लीजिये कागज लठ्ठा तो सब आप ही के पास है। नाप के इन्साफ कर दीजिये। जमीन मेरी है तो कब्ज़ा कुंवर सिंह कैसे ले सकता है। फौज में ऐसा नहीं हो सकता ...फौज में तो...
-ये फौज नहीं है सूबेदार साहब! इस बार लेखपाल की आवाज व्यंग्य था।
-जिसका कब्जा, उसका उपजा। जब आप कब्जा रख नहीं सकते तो जमीन की दावेदारी किस बिना पर करते हैं। फर्ज कीजिये आप की सब बात ठीक है, सब दुरुस्त है। जमीन आपकी ही है और हम पैमाइश करके रकबा निकाल भी दें फिर भी काबिज तो आपको ही होना पड़ेगा। कब्जा तो ले लेंगे पर काबिज रह पाईयेगा ? बोलिये? 
मैं तो बाहर रहता हॅू। तीन महीने से ऊपर छुट्टी कहाँ मिलती है। परिवार रहता है बांसगांव में। यह बेटा है। पढता है। इस मैं दीवानी फौजदारी में लगाना नहीं चाहता।

-तब! तभी तो हम कह रहे हैं सूबेदार साहब यह फौज नहीं है। जैसा भी हो कुंवर सिंह महाशय आपका भाई है-खून है। मिल बैठके बातकर लीजिये। कोरट कचहरी में क्या रखा है? ...जो है कि...
-आप जानते हैं क्या कुंवर सिंह को व्यक्तिगत रुप से  ? सूबेदार साहब ने सशंकित स्वर में पूछा।
-न...न ...नहीं। मैं ...मैं क्यों जानूंगा जो है कि। मैंने बस नाम सुना है वो भी आपसे! आप अपना काम कर दीजिये। एक बार पैमाईश करके हमारा रकबा निकाल दीजिये। लेखपाल साहब कानून का राज है अगर फिर कब्जा किया उसने तो, पुलिस प्रशासन भी कोई चीज है हार थोड़ी न मानूँगा।

-तो फिर तहसील दिवस पर आ जाइये ..जो है कि ...कायदे से ...अच्छा ...नमस्ते सूबेदार साहब। 
कहकर लेखपाल जी बोले- गंगवा वो गंगवा ! एक चाय ले आ एक कड़क और बारात में से अगले आदमी को भेज अंदर। 
बात वहीं की वहीं है। कायदे से होगा सब! यह फौज नहीं है यहाँ कायदे कानून से होता है सब कुछ। एलओसी पर कौन सा कायदा कोई भी किसी को मारता फिरे, जमीन कब्जाता फिरे। कब्जा तो लिया पाकिस्तान, चीन ने भी। कहाँ है कायदा वहाँ कहाँ है कानून? यहाँ सब कायदे से होता है। गैरकानूनी कब्जा भी करो तो कायदे से करो। कायदा! कायदा!! कायदा!!!

  जहां कायदा है वहीं सब का फायदा है। कायदे में ही फायदा है। जो लोग कायदे की बात करते है वह आपके फायदे की बात करते है। बस...
इस बार सूबेदार साहब नाहर को "उस गर्व" से नहीं देख पाये। वह उठे और बाहर निकल गए। नाहर से बोले चलो कल कुंवर सिंह से मिलते हैं।  तहसील दिवस में अभी कई दिन हैं। तेज़ कदमों से कचहरी से बाहर निकलते सूबेदार साहब को देखकर समझ नहीं आ रहा था कि वे गुस्से में ज्यादा हैं या निराश। 

(4)

अगली सुबह सूबेदार साहब अपनी ज़मीन पर गए और देखा कि किस तरह कुँवर सिंह ने ज़मीन पर खलिहान बनाकर कब्जा कर लिया था| एक तरफ आधी दीवार उठ चुकी थी जो स्थाई कब्जा करने की मंशा से बनाई जा रही थी| बरगद का पुराना पेड़ भी काटा जा चुका था जो सूबेदार साहब के दादा ने लगाया था और गाँव भर की औरतें सालों से उसे "वट सावित्री" के रुप में पूजती आ रहीं थीं| सूबेदार साहब को बहुत गुस्सा आया और उससे भी ज़्यादा दुख हुआ| यही सिला मिला है मुझे इन साँपों पर भरोसा करके? यही ईनाम है ज़िन्दगी भर की तपस्या का? 
          कुँवर सिंह का घर ! अहाते में कुँवर सिंह के साथ बैठकी करते चार पाँच लोग दिखे| दूर से ही सूबेदार साहब ने लेखपाल यादव और गंगा को पहचान लिया| उन्हें देखते ही यादव नजरे चुराने लगा सूबेदार साहब का पारा और चढ़ गया|
-राम-राम बड़के भइया! कुँवर सिंह कुटिल मुस्कान के साथ बोला और बैठने को कुर्सी बढ़ा दी। 
-भइया भी कहते हो और घर दुआर पे कब्जा भी करते हो… आस्तीन के साँप को दूध पिलाये हम… रामआसरे चच्चा के मरने पर सात साल के थे तुम… तुमको मार के खा जाता तुम्हारा मामा! कौन बचाया था तब? सुल्ता़नपुर से कौन लाया था यहाँ ? ट्रैक्टर का पैसा भी  हम ही दिये ! बगिया के आम-जामुन सबमें आधा-आधा दिए…वो भी तीन चैथाई मार जाते हो क्योंकि हम तो रहते नहीं यहाँ!!!
- तो काहे नहीं रहते? वहाँ कौन सा तीर मार रहे हो ? सुने हैं…सुने हैं…सब सुने हम…सूबेदर भगवान सिंह के पेशाब से तो पूरी फौज में चिराग जलते हैं… 
- तुम्हारी इतनी औकात कुँवर जबान लड़ाते हो! इन सरकारी कुत्तों को खरीदकर फन्ने खाँ बन रहे हो ! अपनी हद मत भूलो! 
- नहीं तो का ? का उखाड़ लोगे ? हमारे पास कागज भी है और कब्जा भी ! हमारा एक बाल भी नहीं उखाड़ सकते| 
लेखपाल- कानूनगो के बिक जाने से पूरा प्रशासन नहीं बिक जाता| मैं एसडीएम, कलेक्टर सब के पास जाऊँगा, देख लूँगा … 
- अभी देख लो… हा हा हा सुनो दद्दा ! एसडीएम, कलेक्टर को तो आजादी के बाद से आज तक इस गाँव की मिट्टी ने देखा भी नहीं और तुम्हारी उम्र साल में नब्बे दिन है… नब्बे दिन की छुट्टी हा हा हा … छुट्टी खत्म; तो खेल खत्म! जाओ वहीँ बॉर्डर पर अपनी तीरन्दाजी दिखाओ! मूड़ मत खाओ हमारा। हम कहते हैं नमस्ते। 
- कुँवरसिंह याद रखो ये मेरे शब्द- सूबेदार भगवान सिंह का वादा है कि तुम्हे धूल चटा कर अपनी जमीन वापिस लूँगा …नहीं तो नाम कुत्ता रख देना। 
- हा हा हा … भगवान सिंह से सीधा कुत्ता ! हा हा हा ! 

इतना सुनते ही नाहर से रहा न गया और
’’चटाक’’ 
खीचकर एक तमाचा मारा नाहर ने कुँवरसिंह को|  फिर क्या था, हाथापाई शुरु|  किसी तरह सब ने दोनों को अलग अलग किया| पूरे रास्ते नाहर सूबेदार साहब से डांट खाते और भाषण सुनते घर लौटा| रात में दोनो में से कोई नहीं सोया|  सुबह जल्दी हो गई|  पांच बजे ही सूबेदार साहब वापिस जाने को तैयार होने लगे| छुट्टी खत्म हो चुकी थी| सब बातें अधूरी रह गयीं थीं| सावित्री की तबियत का हाल पूछा न जा सका| छोटू की ड्राईगं बुक देखी न जा सकी| जमीन के लिये तहसील दिवस में एसडीएम, कलेक्टर से भी न मिल सके| सब बातें अधूरी रह गयी थीं पर छुट्टी पूरी हो गई थी| सब उदास बैठे थे| सबकी आँखो में आँसू थे| सूबेदार साहब का एक पैर देहरी से बाहर निकला ही था कि छोटू दौड़कर आया और चिपक गया।
- बाबू हमें साईकिल कपड़े कुछ नहीं चाहिए …बस आप चाहिये! एक् दिन और नहीं रुक सकते क्या? इतना कहते ही दो आँसू छोटू के गालों पर लुढ़क पड़े और माहौल भारी हो गया।

(5)

पानी लगातर टपक रहा था ! कड़ाके की सर्दी!  बर्फीली हवाओं की सुइयाँ सी चुभ रही थीं! पूरा शरीर सुन्न सा हो रहा था| सांसें बोझिल हो रही थी। तीन गोलियाँ लगकर पार हो गयी थीं, मिट्टी में खून पानी की धार से मिलकर उसे काला सा बना रहा था फिर भी हाथ में सूबेदार साहब अपनी रायफल को मजूबती से थामे हुए थे| वो बाहर भी लड़ रहे थे-अन्दर भी। अन्दर से आवाज आई-’’अब मर जा!’’ लगा कि उनके मरने का वक्त आ गया है, फिर भी उन्होंने लम्बी साँस खीचकर बन्दूक को कसकर पकड़ लिया| अभी लड़ाई चलनी थी बाहर भी और अंदर भी … थोडी और देर तक।
          झाडी के पीछे से हरकत बन्द हो गई थी जिसका मतलब था कि आतंकवादी घुसपैठिया या तो मर चुका था या भाग निकला था। सूबेदार साहब ने वायरलैस पर बताया कि एलओसी के इस हिस्से में घुसपैठ की कोशिश हुई है, जिसे रोकने के लिए फायर किये गए और जवाबी फायरिंग भी हुई। कम से कम तीन गोलियाँ लगी हैं, पहली पैर में, दूसरी पेट में नीचे की ओर और तीसरी सीने में दांयी तरफ| 
उनके हाथ से रायफल गिर गई और लगा कि एक बडी चट्टान की आड़ में मरने की तैयारी हो रही है| मगर उनका एक हाथ उनकी  बायीं जेब पर जमा हुआ था जिसमें उन्होंने नाहर के लिए एक चिठ्ठी लिख रखी थी| इसे वो हमेशा अपने पास रखते थे|  खास तौर पर ड्यूटी के समय| कभी किसी ने पूछा तो कहा कि अगर मैं अपनी पोस्ट पर मर जाऊॅ तो इसे मेरी जेब से निकाल कर देख लेना इस पर उसका नाम है जिसके लिए चिठ्ठी है और इसे उस तक पहुँचा देना।
सूबेदार साहब का शरीर ठंडा पड़ने लगा और तकरीबन आधे घंटे के भीतर वे वीरगति को प्राप्त हो गए |


(6)

अपने दादा के वीरता के मैडल नाहर ने जलते चूल्हे में डाल दिए| उसका मन उद्विग्नता और क्षोभ से भरा हुआ था| उसने सोच लिया की चाहे जो हो जाये वो अब फ़ौज में नहीं जायेगा बस! 
तभी डाकिये ने उसे वो चिट्ठी लाकर दी |

"बेटा नाहर,
तुम यह चिट्ठी पढ़ रहे हो मतलब कि अब तुमसे कुछ बातें कहने का समय आ गया है| मैं अपनी मौत के बारे में कुछ नहीं कहूँगा | बस अपनी मनोदशा और उस तर्क के बारे में बात करूँगा जिसके कारण मैंने ये नौकरी करने और जारी रखने का फैसला किया | 

बलिदान एक उदात्त संकल्पना है । उसमे दान यानि देने की प्रवृत्ति झलकती है | समर्पण की भावना है | इष्ट के प्रति साधना विश्वास और श्रद्धा आदि प्रकट होते हैं | यहाँ बलिदान से मेरा तात्पर्य है अपने इष्ट को सिद्ध या प्रसन्न करने के लिए कुछ भेंट स्वरुप चढ़ाना जैसे पहेल की देवी देवताओं के लिए बलि दी जाती थी | 

मगर यह दर्शन संकीर्ण है | इकतरफा है और अपूर्ण भी है | इसकी व्याख्या दो चरणों में की जा सकती है | 

पहले तो बलिदान निःस्वार्थ हो यह नितांत दुर्लभ है | बलिदान में प्रत्याशा होती है | बदले में कुछ पाने की लालसा होती है | अभीष्ट के न मिलने पर निराश भी होती है | बलिदान कुछ पाने के लिए उसकी कीमत चुकाने जैसा है बस यहाँ कीमत पहले अदा की जाती है | बलिदान वास्तव में "दान" नहीं है | यह एक सौदा है, खरीद फरोख्त है यहाँ तक कि  भ्रष्टाचरण है | जब हम बलिदान की व्याख्या को अतिशय तक खींचकर भ्रष्टाचार तक ले आते हैं तब पाप और पुण्य का भेद मिट जाता है | ऐसा लगने लगता है की जो आचरण अभी तक उदात्त बलिदान था वह सहसा लालच, स्वार्थ और भ्रष्टाचार बन चुका है | अब अच्छे बुरे का भेद मिटने लगता है | काल सफ़ेद में घुलने लगता है | दोनों के मिलने से सिलेटी बनने लगता है जो कभी सफ़ेद लगता है तो कभी काला पर होता इन दोनों में से कोई भी नहीं है | 

दूसरी बात और भी ज्यादा चौंकाने वाली है | यह दान लेने और देने वाले के बीच का समझौता है जिसमे दान की जाने वाली "वस्तु" की अपनी कोई हैसियत नहीं है | वह वस्तुमात्र है क्योंकि वस्तुतः उसकी अपनी कोई वास्तविक पहिचान नहीं है | वह हेय है | बलिदान ही उसकी पहिचान है | बलिदान हो जाना ही उसकी नियति भी है और प्रगति भी | यही उसकी परम सुगति है | उसकी अपनी इच्छा के कोई मायने नहीं हैं | सोचो न कितनी गायों, खेतों, दास, दासियों को दान किया गया क्या कभी उनसे उनकी सहमति  ली गयी ?

कम से कम इन दो जगहों पर बलिदान का संकीर्ण और स्याह रूप सामने आता है लेकिन इसी व्याख्या में थोडा आगे और बढ़ें तो बलिदान का एक रूप ऐसा भी है जो सब बातों से ऊपर है | वह सचमुच श्रेष्ठतम है | सबसे निर्मल, सबसे उदात्त और पवित्र- वह है आत्म बलिदान | आत्मबलिदान वह है जिसमे दान करने वाला और दान की जाने वाली "वास्तु" दोनों एक ही हों । 

आत्मबलिदान निःस्वार्थ होता है | इसमें प्रत्याशा नहीं होती | खुद को बलिदान करने में चूँकि जीवन का अंत होजाता है अतः निराशा भी नहीं होती | यहाँ काला सफ़ेद को गंदा नहीं कर पाता | बलिदान और आत्मबलिदान में यही मुख्य अंतर है की एक में कामना है दूसरा निष्काम | अब सवाल यह उठता है की क्या सभी आत्मबलिदान एक से होते है ? क्या सब का महत्त्व सामान है ? तो इसका जवाब भी है | 

दो बिलकुल अलग अलग नदियों का निष्कर्ष और पराकाष्ठा एक ही समुद्र हो सकता है मगर इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि दोनों नदियाँ एक सी हैं या दोनों का महत्व सामान है | नदियों में भिन्नता तो इस बात पर निर्भर करती है कि उनका पानी प्राणिमात्र के लिए कितना उपयोगी या अनुपयोगी है | समुद्र तो उनका आखिरी पड़ाव है जो सबसे कम महत्त्व रखता है | इसी तरह आत्मबलिदान का महत्त्व इस बात पर निर्भर है की यह किया किसके लिए गया | यदि यह निःस्वार्थ है तो श्रेष्ठ है नहीं तो इसमें भी कोई ख़ास बात नहीं | 

आत्मबलिदान में "वस्तु" स्वयं को बलिदान कर देती है खुद की इच्छा से- यही इसकी शक्ति है | इसकी सबसे बड़ी कमजोरी इसकी शक्ति में ही अन्तर्निहित है | अगर कोई व्यक्ति किसी हेतु के लिए स्वयं को समाप्त कर दे तो उसको क्या मिला जो बलिवेदी पर चढ़ गया | जब तक जान है तभी तक जहान है | जीवन के उच्छेद के बाद किसी के होने न होने से क्या फर्क पड़ता है | जो भोग लो वही सुख है | उच्छेद के बाद भोग संभव नहीं तो सुख का तो प्रश्न ही नहीं उठता | कुछ लोग यह तर्क रखते हैं कि यह भी तो हो सकता है कि आत्मबलिदानी के सुख का केंद्र स्वयं के बलिदान में ही हो ! मगर यह उसकी क्षणिक तात्कालिक मनोदशा भी तो हो सकती है- इसका क्या जवाब है? मनुष्य तो परिवर्तनशील है ही उसका मन तो ब्रह्माण्ड में सबसे जल्दी बदलने वाली चीज़ है । हो सकता है कुछ साल और जीवित रहने पर उसके "सुख का केंद्र" बदल जाता मगर आत्मबलिदान ऐसी सभी संभावनाओं को समाप्त कर देता है | मरने के बाद सुधार की कोई गुंजाइश नहीं | इस रास्ते पर पीछे जाने की कोई संभावना नहीं ! 

फिर भी इस तरह के दुरूह रास्तों को चुनना पड़ता है | अँधेरी कोठरी में एक कमज़ोर सा ही सही मगर दिया जलाना पड़ता है| किसी को तो ये करना ही पड़ता है| यहाँ मैंने वो "किसी" होना चुना! 
तुम्हारा निर्णय अपना है जैसा चाहो चुनो लेकिन इतना जान लो कि मुझे अपने फैसले पर कोई दुःख या पछतावा नहीं है क्योंकि इस अंत को ध्यान में रखकर ही मैंने ये निर्णय लिया था | तुम भी वही करना जिसमे तुम्हे कभी पछतावा न हो |”

चूल्हे की आग ठंडी होती रही | रात बीतती रही |
अँधेरे कमरे में कोने पर एक धुंधली शिखा वाला दिया अब भी जल रहा था |

Wednesday, 29 May 2013

अभयवाद

कहीं जातिवाद की जोंकें हैं 
कहीं क्षेत्रवाद के क्षत्रप 
कहीं व्यक्तिवाद का विष मानव 
कहीं वंशवाद के तक्षक 

इस भक्षक व्यूह को तोड़ सके 
बस अभयवाद इक रक्षक  

जो सबको धूल चटा दे 
वादों से वाद मिटा दे 

कृष्ण कोठरी में रहकर 
जो निर्विवाद है 
वह अभयवाद है  !


सत्तावन से सैंतालिस तक
संघर्ष हुआ प्रतिवर्ष हुआ
कुछ शीश कटे कुछ रक्त बहा
यह पीढ़ी सब कुछ भूल चुकी
अब किसे याद है ?

जो सब कुछ स्मरण करा दे
नस नस में आग बहा दे
वह अभयवाद है !

यह शाश्वत "स्वर"
यह मौन मुखर
यह विप्लव ध्वनि
यह शक्ति प्रखर

यह प्रलयनाद है
यह अभयवाद है !



Friday, 24 May 2013

माँ


जब नींद नहीं आती
तब तुम याद आती हो ।

जब तुम याद आती हो
तब नींद नहीं आती । 

तीसरा जहाँ, नौवाँ पहर


मैं तेरी चाह में भटकता फिरा दोनों जहाँ
तू मेरी आस में तड़पती रही आठों पहर
मैं तीसरे जहाँ की आस में हूँ आज तलक
तू नवें पहर की चाह में है शाम सहर

ये ज़मी और चाँद रात भी मिले हैं कभी 
एक बार फिर से वो जुम्बिश है आजमाइश है
ऐसा भी कभी दुनिया में होता है कहीं !
ऐसा भी कभी दुनिया में होता तो नहीं !

ये अलग बात है तुम अब भी मुझमें शामिल हो
मगर रज़ा है के अब रुबरु हो हासिल हो
मुझे यकीं है हम मिलेंगे इस सफ़र में कहीं
जहाँ हो तीसरा या नौवाँ पहर ही सही

ये ज़मीं चाँद रात रुक के हमसे पूछेंगे
के कुछ अजब है इस जुम्बिश में आजमाइश में
ऐसा भी कभी दुनिया में होता है कहीं !
ऐसा भी कभी दुनिया में होता तो नहीं !

मैं ये कहूँगा ये ग़ज़लें है- जुम्बिशें इनकी
बतौर नज्मों के ये ज़ोर आजमाइश है
इन्ही ने तीसरा जहाँ नया बनाया है
इन्हीं की नौवें पहर की ये फरमाइश है

मेरी कलम भी तुम्हीं हो मेरा कलाम तुम्हीं 
इसी कलाम से तुम तक पहुँच की ख्वाहिश है
ऐसा भी कभी दुनिया में होता है कहीं !
ऐसा भी कभी दुनिया में होता तो नहीं !

#तुम्हारे लिए

गर मैं कुछ ऐसा कर पाऊँ



क्लाइमेट चेंज के मंच सजे 
हैं ग्रीन ग्रोथ के अधिवक्ता
हैं सावन के अंधे सारे
जिन्हें दीखे सब कुछ हरा-हरा

गाँवों के सूखे चेहरों की
कालिख अगर मिटा पाऊं
तो मानूँगा मैं भी कुछ हूँ
गर मैं कुछ ऐसा कर पाऊँ

वे छोटे लड़के गंदे से
दिन भर जो कचरा बिनते हैं
चौराहों पर फुटपाथों पर
फेंके हुए सिक्के गिनते हैं

उन कूड़े वाले हाथों में
गर कागज़ कलम थमा पाऊं
तो मानूँगा मैं भी कुछ हूँ
गर मैं कुछ ऐसा कर पाऊँ

मैं मुखर निडर आलोचक हूँ
सच कहने का दम भरता हूँ
वाणी से गरल उगलता हूँ
सच कहने से कब डरता हूँ !

गर खुद की निंदा के दो "स्वर"
बिन क्रोधित हुए पचा पाऊँ
तो मानूँगा मैं भी कुछ हूँ
गर मैं कुछ ऐसा कर पाऊँ

बेहतरीन बकवास


एक टूटते टूटते जुड़ जाती है
दूजी जुड़ते जुड़ते टूट जाती है

एक आस है
दूजी साँस है

दोनों मिलाके ज़िंदगी बनती है
जो बेहतरीन बकवास है ! 

शायर की शहादत

शायर को मरना होगा...

तोड़ के
चूरा करके
उस 
बेख़ौफ़
बेलौस
बेमुरव्वत
बदतमीज़ मगर सच्चे शायर को
खाद बनाई जाये 

कत्ले आम शायर का वक़्त की नज़ाकत है
नस्ल ए हिन्दुस्तान को खाद की ज़रूरत है !

शायर की शहादत से औज़ार रवाँ होता है
इन्कलाब होता है मुल्क़ जवाँ होता है !



Saturday, 18 May 2013

काली चुड़ैल

बहुत पुरानी बात है । एक गाँव था- झील वाला गाँव । तीन ओर पहाड़ियों से और चौथी ओर से झील से घिरा । सोया-सोया सा शांत सा गाँव । गाँव वाले भेड़ बकरियां पालते और दुनिया से कटे इस गाँव में खुश रहते । कोई चिन्ता नहीं थी सिवाय काली चुड़ैल के । 

काली चुड़ैल अपने नाम के ही अनुसार काली और नौ फुट लम्बी थी । कहते थे उसकी तीन आँखें थीं- दो आगे; एक पीछे । सबका मानना था की उसकी तीसरी आँख ज़रूर सिर में पीछे की तरफ रही होगी तभी तो वो एक ही समय में चारो तरफ देख लेती थी । उसके नाख़ून लोहे के थे । दस हाथियों की ताक़त थी उसमे । मरे हुए बैलों को मीलों घसीट कर ले जा सकती थी । कभी कभी बैलों और बकरियों की हड्डियाँ पहाड़ियों के उस ओर मिला करती थीं । 

जाने कहाँ रहती थी ! कहते हैं तीनों पहाड़ियों में कुल मिला कर जो सत्तासी गुफाएं हैं उन्हीं में से किसी एक गुफा में रहती थी काली चुड़ैल । मगर एक बात पक्की थी अमावस की रात निकलती थी वो !
पहले झील में नहाती थी । फिर पहाड़ियों के जंगलों में घूमती फिरती । सरसराती जोर की हवाएं जब सूखे बांसों के कोटरों में पड़ती तो भयानक सूँ sss सूँ sss सूँ  की आवाजें पूरी वादी में भर जातीं । गाँव के लोग जान जाते कि अब चुड़ैल नाचेगी । 

चुड़ैल नाचेगी ! बाप रे !! इसका एहसास होते ही लोग घरों में बंद हो जाते । दुबके रहते क्योंकि सबको पता था कि जी भरकर  नाच लेने के बाद काली चुड़ैल और भी भूखी हो जाती थी । अब थकी,भूखी, खूंखार चुड़ैल पहाड़ियों से उतरकर गाँव में मंडराती- कनेर के फूल, हरी दूब और मेमनों  की तलाश में ।  यही सब पसंद था उसे । पीले पीले कनेर के फूल खूब हरी दूब और छोटे मेमने ! एक में कहाँ भूख मिट ती थी उसकी- कभी तीन कभी चार मेमने गायब ! पूरा निगल जाती थी- हड्डियों सहित ! 

लेकिन इतने से ही उसका मन न भरता । जाते जाते गाँव को अभिशप्त भी कर जाती जब तब । कहते हैं एक बार कोई मेमना नहीं मिला था चुड़ैल को, गुस्से में आके उसने गाँव पर जादू टोना कर दिया कि गाँव के सब लोग अंधे हो जाएँ । जादू एकदम पक्का था उसका बहुत से लोग अंधे हो गये बहुतों की आँख की रौशनी जाती रही । हर अमावस की रात वो आती और टोना बाँध जाती । 

काली चुड़ैल के अलावा एक और ख़ास बात थी उस झील वाले गाँव की और वह था "झील वाली माता" का मंदिर । झील के किनारे माता की लाल मूर्ति वाला पुराना मंदिर । कहते हैं ये लाल मूर्ति उस बड़े से पत्थर से बनी थी जो झील में से बहुत पहले निकाला गया था । वास्तव में यह झील जीवनदायनी थी । यही झील पीने के पानी का एकमात्र स्रोत थी पिछले पचास एक सालों से जब से पहाड़ियों का वह आखिरी झरना सूखा था । 
झील का पानी हल्का लाल था लेकिन था बहुत मीठा । इतना मीठा की आधा ग्लास से ज्यादा कोई पी भी न सके ।  झील वाली माता ने पानी में "शांति के तत्व" भी घोल रखे थे शायद ।  अच्छी नींद आती थी पीकर । भेड़  बकरियां तो मानों नींद में ही रहती थीं । दो कदम भी नहीं चल पाती थीं भेड़ें जब तक उन्हें आवाज़ देके दिशा न दिखाओ । 

चुड़ैल के जादू से जब सब अंधे होने लगे और झील वाली माता के मंदिर आकर भव्य अनुष्ठान किया गया तो साल भर के भीतर ही चमत्कार हुआ । अजीब सी कांच की बड़ी बड़ी शीशियों में हरी पीली दवा दिखाई पड़ी लोगों को मंदिर के अन्दर । वो भी ठीक अमावस की रात के अगले दिन । लोगों को यह समझते देर न लगी कि अमावस वाली रात को चुड़ैल के हर टोने के बाद झील वाली माता ये दवाइयां देती हैं गाँव को । दवा को प्रसाद के रूप में ग्रहण करने पर लोगों की नज़र में सुधार हुआ । रौशनी वापस आने लगी । अब तो हर अमावस की रात के बाद लोगों को इस दवा का ही आसरा होता । गाँव के बड़े बूढ़े तड़के हरी पीली दवा की शीशियां मंदिर से लाकर झील के पानी में घोल देते । पानी को पीने से पूरे गाँव का अंधापन जाता रहता । 

यह तो झील वाली माता की कृपा ही थी वरना तो काली चुड़ैल के जादू से पूरा गाँव कभी का अँधा हो चुका होता ! 
"देवी माताएं बोलती नहीं- मौन रहती हैं । एकदम मूक । बस आशीर्वाद बरसाती हैं देवी माताएं ! झील वाली माता की जय हो !!"


(2)


आखिर कब तक चलता ऐसे डर डर के । एक दिन गाँव के बीस पच्चीस जवान लोगों ने चुड़ैल को मारने की ठानी । पूरी तैयारी की  गयी बल्लम भाले बरछी गंडासे पैने किये गए और अब इंतज़ार बस अमावस की रात का था ।  
अमावस की रात !
घुप्प अँधेरा । जोर की हवाएं ! बासों के सूखे झुरमुट के कोटरों से हवाएं टकराती जातीं- सूँ sss सूँ sss सूँ   । अब चुड़ैल आएगी कनेर के फूल, हरी दूब और मेमनों  की तलाश में । अभी तो नाच रही होगी । पहाड़ी पर होगी ...जाने कब तक आएगी! तभी एक लड़का चिल्लाता है वो देखो मंदिर के पीछे कोई घूम रहा है । ध्यान लगा के देखा सबने; हाँ कुछ तो है ! लेकिन नौ फुट लम्बा नहीं होगा । 

अरे भागी ! काली चुड़ैल ही है ! भाग रही है ! मगर उतनी तेज़ भी नहीं ! उसके हाथ में देखो दो मेमने तो दिख ही रहे हैं ! भागो ! भागो !! मारो ! मारो ! बच के न जाये !

बीस पच्चीस आंशिक रूप से अंधे लोगों का झुण्ड हाथ में बरछी भाले लिए चुड़ैल की और लपका । चुड़ैल भागी, उसने सामना नहीं किया । शायद भूखी और थकी हुई थी इसीलिए मेमने लेकर भागती रही । फिर मेमने उसके हाथ से गिर गए- ऊपर चढ़ती रही पहाड़ी पर । अब तक लोग काफी करीब आ गए थे- एकदम पास तक । तभी चुड़ैल-जो एक काले रंग का लबादा ओढ़े थी - एक गुफा में घुसने लगी । 

खचाक्क्क्क !
एक नुकीला भाला आकर पीठ में लगा चुड़ैल के और चुड़ैल वहीँ बैठ गयी । लोग जहाँ थे वहीँ रुक गये; डर के मारे कांपने लगे । वे जानते थे की अब चुड़ैल घायल है भूखी है और खूंखार भी है । यह भी जानते थे कि अपनी तीसरी आँख से सबको देख रही है और अगला वार काली चुड़ैल का ही होगा । अब तो वो अपनी गुफा के पास भी आचुकी है और वे लोग गाँव से काफी दूर; अब तो भागना भी बेकार है । बचना मुश्किल है । सब मरेंगे । सबसे बदला लेगी वो । सबके खून जम गए और साँसें थमने लगीं । 

लेकिन यह क्या ! काली चुड़ैल लुढ़ककर एक ओर  गिर गयी । पौ  फट चुकी थी; चेहरे पहचान में आने लगे थे । चुड़ैल के शरीर में जो हरकत और जुम्बिश हो रही थी वो भी धीरे धीरे बंद होने लगी । थोड़ी देर में चुड़ैल का शरीर एकदम शांत हो गया । 
तो क्या मर गयी काली चुड़ैल ! इतनी आसानी से! किसी ने पास जाके देखा- सचमुच मर चुकी थी वो ! पूरे गाँव में ख़ुशी की लहर बिजली की तरह दौड़ गयी । मगर रुको ! ये तो कोई चुड़ैल नहीं है- बुढ़िया है ये । बुढ़िया ! कौन बुढ़िया ?

कोई पहिचान नहीं पाया उसे । न उसके तीन आँखें थी न ही लोहे के नाख़ून ! उम्र सत्तर अस्सी के बीच रही होगी । तभी भाग नहीं पा रही थी । उसकी गुफा में एक भरी पूरी घरेलू प्रयोगशाला सी थी । रासायनिक उपकरणनुमा तामझाम में एक किनारे कांच के बर्तन में झील का लाल पानी भरा था जिसमे मेमने की हड्डियाँ, हरी दूब और पीले कनेर के फूलों की पत्तियां दिखाई पड़ रही थीं । उपकरण के बीच बीच में बहुत सारे यंत्र से लगे थे जिसके दूसरे छोर पर हरा पीला द्रव टपक रहा था जो एक बड़े से बर्तन में इकठ्ठा हो रहा था । पास ही दर्जन भर खाली शीशियाँ बड़े करीने से रखी थीं ठीक वैसी ही शीशियाँ जो अमावस के बाद मंदिर से मिला करती थीं । 

ये चुड़ैल नहीं थी । ये तो दवा बनाती थी यहाँ । तो क्या इस झील के लाल पानी में अँधा कर देने वाला ज़हरीला रसायन घुल हुआ है ? वो लाल मूर्ति वाला पत्थर भी ज़हर है । ऐसे बहुत सारे पत्थर हैं झील की तली में । मतलब झील वाली माता जैसी कोई देवी नहीं हैं ! मतलब कि झील ही चुड़ैल है असल में जो लोगों को अपने पानी से अन्धा कर रही थी झरने सूख जाने के बाद से ! और यह चुड़ैल असल में चुड़ैल नहीं देवी थी ! दवा की देवी !! मगर ये छुप के क्यों रहती थी? किसी को पता तक नहीं चलने दिया !

चुड़ैल रुपी देवी का शरीर शांत पड़ा था । एकदम मौन थी वो । चारों तरफ निस्तब्धता और मौत का सन्नाटा छाया हुआ था । 

''देवी माताएं बोलती नहीं- मौन रहती हैं । एकदम मूक । बस आशीर्वाद बरसाती हैं देवी माताएं ! दवा वाली माता की जय हो !"

-स्वर (17 मई 13)














Sunday, 28 April 2013

संसद


अच्छा ही हुआ
आज हम बेवजह निकले

बहुत ऊँचे कंगूरों के बाशिंदे भी
आदमकद ही निकले

कंगूरों के कबूतर
भोले निकले
उजले निकले
बेहतर निकले 

Sunday, 17 March 2013

पानी के दाग


शीशे के निचले किनारों पर
पानी के दाग
अक्स को उम्र अता करते
पानी के दाग

आँखों के शीशे
अब धुंधलाते जाते हैं
तुम जान में तो आते हो
पहचान में आते नहीं
कैसे मिटाए कोई
किस पानी से धोये इन्हें

ये पानी के दाग
ये पानी के दाग...

Tuesday, 27 November 2012

तेरे अशआर काफ़ी हैं !


यूँ तो लिखने वालों की भरमार काफ़ी है
पर हिन्दी में लिखने की दरकार काफ़ी है

दुनिया कहती है कि परबत कट नहीं सकता
मुझको लगता है कि मुझमें धार काफ़ी है

सच्चे लोगों की चमड़ी से जूते ही बनते हैं यहाँ 
ऐसे सच्चे लोगों का अम्बार काफ़ी है

दस्तरखान सज़ा होता है सब लाइन से खाते हैं
भ्रष्ट अफसरों में भी शिष्टाचार काफ़ी है

सच का रस्ता मुश्किल है पर गर ऐसा हो पाए तो
तख्त पलटने को सच्चा अख़बार काफ़ी है

ज़िंदा पेड़ कलम कर कितनी मुश्किल से ये नाव बनी
नाव डुबाने को टूटी पतवार काफ़ी है

रंगमंच है दुनिया सारी हम सब इसकी कठपुतली
हर नाटक में इक उम्दा किरदार काफ़ी है

कैसे तुम आज़ाद हुए थे वो सब याद दिलाने को
बस पुरखों की ज़ंग लगी तलवार काफ़ी है

कोने में चुपचाप खड़ा है शायर है, कायर तो नहीं
ऐसा वैसा दिखता पर तैयार काफ़ी है

बड़ी बड़ी बातों के माने क्या समझें, हम हैं बुद्धू
छोटी मोटी बातों का विस्तार काफ़ी है

पीने वाला बैठ के अपनी दुनिया तय कर लेता है
इक दाएँ इक बाएँ बस दो यार काफ़ी हैं

भीषण बरखा, तेज़ हवाएँ, गीली लकड़ी फ़िक्र न कर
आग लगेगी “स्वर” तेरे अशआर काफ़ी हैं

Sunday, 25 November 2012

दस रुपये के अन्नानास

(1)

शशांक आज शाम फिर उसी बेंच पर बैठा था मगर अकेले, स्नेहा कहाँ थी वहाँ! यह वही पुराना पार्क था, सामने वही बच्चे खेल रहे थे, आसमान में वही परिंदे घर लौट रहे थे, पार्क की वही बेंच जहाँ दोनो ढाई साल पहले मिले थे, ज़मीन पर वैसी ही घास थी, सब कुछ वैसा ही था बस स्नेहा वहाँ नहीं थी | उसकी कमी बैठी हुई थी, बेंच पर, शशांक के पास | उसे पता था की स्नेहा की कमी का एहसास उसकी कमी को पूरा तो नहीं कर सकता लेकिन इस बेंच को तो भर ही सकता है |

वो उठा और तेज़ कदमों से चलकर पार्क के बाहर खड़े बाबा से बोला-
-        10 रुपय के अन्नानास दे दीजिए !
-        कोई और भी है या आप अकेले हैं?
-        कोई और भी है मगर मैं अकेला ही हूँ…
-        मेरा मतलब दो टूथपिक दूँ जैसे पहले देता था… या एक?
-        दो दे दीजिए…

शशांक वापस पार्क की तरफ बढ़ा पर आज वो तेज़ी नहीं थी जो तब हुआ करती थी जब जब स्नेहा वहाँ उसका बेसब्री से इंतेज़ार किया करती थी | वो दूर पार्क के बाहर से ही उसे देखता मुस्कुराता और लगभग भागता हुआ आता | स्नेहा बेंच पर बैठकर कुछ गुनगुनाती रहती, मुस्काती रहती, कभी बाल सँवारती तो कभी इनबॉक्स में शशांक के पुराने मेसेजेस पढ़ती रहती |स्नेहा की एक और आदत थी जो शशांक को बहुत प्यारी लगती थी | खुद स्नेहा से भी ज़्यादा प्यारी और वो थी उसका बेंच पर बैठकर धीरे धीरे चूड़ियाँ पहनना | स्नेहा जानती थी की शशांक को चूड़ियाँ पसंद हैं- हर रंग की- तरह तरह की- काँच की, लाख की- लाल, पीली, नीली, नई, पुरानी, मोटी, पतली चूड़ियाँ |उसे यह भी पता था की चूड़ियों से ज़्यादा शशांक को उसे चूड़ियाँ पहनते देखना पसंद था |

यही किस्सा कान की बालियों का भी था इसीलिए स्नेहा अपनी चूड़ियाँ और बालियाँ पर्स में लेकर आती और इंतेज़ार करती कि शशांक अन्नानास लेकर आ जाए तो वा शुरू करे उसे ललचाना |
शशांक की निगाहें चूड़ियों पर पड़ती तो उसकी आँखों का रंग बदल जाता और चूड़ियाँ पिघलने लगती | वो देखता रहता बस और स्नेहा चूड़ियाँ पहनती जाती- बीच बीच में उसे देखकर मुस्कुराती-

-        क्या देख रहे हैं जनाब?
-        कुछ नहीं…
-        कुछ तो?
-        वो…ये… मेरा मतलब यह है कि आप ये सब अपने घर से करके आया करिए, सरे बाज़ार बनना संवरना ठीक नहीं…यहाँ बिजली गिराने की कोई ज़रूरत नहीं है!
-        हुँह ! बिजली क्या गिरानी ? लोग तो पहले से निसार हैं…चलिए जनाब ये आख़िरी चूड़ी पहना दीजिए…फिर बालियां भी तो हैं!
-        सच्ची!

कहकर शशांक की आँखें फैल गयीं जैसे की उसे पता ही नहीं था की आख़िरी चूड़ी उसके नाम है; झटके से चूड़ी ली तो अन्नानास गिर गये !
शशांक चौंक कर जागा क्यूंकी आज फिर उसके हाथ से अन्नानास गिर गये थे…

कहते हैं अगर कोई अपशकुन बार बार हो तो उसके मायने इंसान को पढ़ लेने चाहिए | अन्नानास तो कई बार गिरे थे मगर आज उनके गिरने के मायने और थे क्यूंकी आज उन्हे उठाने वाला कोई न था, एक का शरीर न था एक का मन न था !

उसके बाद थोड़ी सी शाम गहराने लगती थी और स्नेहा हर दूसरे वाक्य के बाद एक ही बात दुहराती रहती थी-
-        अब हमें जाना है…

वो बस इतना कहती भर थी, जाती नहीं थी | उसे कहना अच्छा लगता था “अब हमें जाना है…” और उसके बाद शशांक का उसे रोकना- शायद ये ही सबसे ज़्यादा पसंद था उसे!

-        कहाँ जाना है? कहाँ जाना रहता है आपको हरदम? चुपचाप बैठी रहिए! 
शशांक मुँह फुलाकर बैठ जाता | कभी मुँह फेर लेता तो कभी बुदबुदाने लगता |

-        मुझे पता है कि आपके पास साढ़े सात तक का टाइम है, आपकी गुलामी तो उसके बाद शुरू होती है मोहतरमा!
-        और क्या क्या पता है वैसे सरकार को?, चुटकी लेते हुए स्नेहा चहकी |
-        अरे तुम खूब जानती हो कि तुम्हारे रट लगाने के काफ़ी देर बाद तक मैं तुम्हे जाने नहीं देता, इसीलिए मार्जिन लेके सात बजे से ही रट लगानी शुरू कर दी है आजकल | सात बजे से ही रोना पीटना शुरू कर दिया तो साढ़े सात तक तो मैं जाने के लिए हामी भर ही दूँगा | हुँह |

और ये कहकर शशांक स्नेहा की आँखों मे उतर जाता जो पहले से ही मुस्कुरा रही होती थी |गहरी आँखें | बड़ी बड़ी आँखें | बोलती आँखें | रोशन आँखें | आँखों के काले कुओं के अंदर फँसा शशांक भीगता जाता, डूबता जाता |आँखों के कुएँ के चारों ओर स्नेहा ने काजल की एक पतली बाड़ सी लगा रखी होती थी, जिससे शशांक हार जाता था| कितनी मिन्नतें करता था निकलने की लेकिन उन मुस्कुराती आँखों के कुएँ से निकलना आसान काम था क्या?

तभी शशांक उसका हाथ धीरे से पकड़ लेता और स्नेहा की आँखों का तिलिस्मी कुआँ टूट जाता | अब बारी शशांक की होती और स्नेहा की तिलिस्म खो चुकी आँखें बंद हो जाती थी |
शशांक धीरे से उसके हाथ की मेंहदी को देखता और कहता की उसने क्यों लगाया है ये सब हाथ में…हाथ कितने गंदे से कर लिए ! इसपर स्नेहा झूठ मूठ का गुस्सा होती और कहती कि जिसके नाम पर लगाया वो तो बुद्धू का बुद्धू ही रहा!

असल में शशांक मेंहदी के पीछे की लकीरों को देखता था | एक बार तो अपने नाख़ून से खुरचकर उसने एक लकीर पर अपना नाम लिखने की कोशिश भी की थी | मगर इस तरह लिखे नाम और मेंहदी का रंग कितने दिन टिके हैं?

-        छोड़ो मेरा हाथ | जाने क्या टटोलते रहते हो! 

कहकर स्नेहा थोड़ा शरमाती, थोड़ा खुश होती और हाथ छुड़ा लेती |वो जानती थी की शशांक उसका हाथ फिर से पकड़ेगा, कितना भी हाथ छुड़ाए शशांक थाम लेगा और पिछली बार से ज़्यादा शिद्दत से थाम लेगा | अच्छी बात ये थी की वही होता था जो स्नेहा मन ही मन चाहती थी | शशांक ने सचमुच उसका हाथ थाम लिया था | काश आज भी वही होता जो स्नेहा चाहती थी | काश! 

-        यह है भाग्य रेखा, काफ़ी लम्बी लाइन है, तुम बहुत लकी हो, यह है हृदय रेखा; तुम्हारी भाग्य रेखा और हृदय रेखा को एक और रेखा मिला रही है |
-        इससे क्या होता है?
-        इससे आपको जीवन में वो मिल जाता है जिसको आप चाहते हैं| 
-        तुम्हारे नाम की रेखा कहाँ है?
-        ओहो!

यही तो वह सवाल था जिसका जवाब शशांक आज भी ढूँढ रहा था | तब से अब तक, तब भी वह चुप हो जाता था आज भी चुप था | उसने अपना हाथ फैलाया जोकि खाली था | जिसमे स्नेहा का वो हाथ नही था, वो लकीर भी नहीं थी जिस पर वो अपना नाम लिखा करता था | आँखें डबडबा आईं | पहले एक, फिर दूसरा आँसू | उसकी हथेली पर दो बूँदें गिरीं | उसे लगा ये मोतीआसमान से गिरे हों शायद ! उसे पता ही नही चला की ये वो मेघ है जो स्नेहा की आँखों वाले कुएँ के पानी से बना है | ये था स्नेहा की काली आँखें और काले काजल से बना काला बादल | ये काला बादल उसकी आँखों से नहीं स्नेहा की खुद की आँखों से आया था | बस बरसात यहाँ हुई थी | बादल ऐसे ही होते हैं | बरखा भी ऐसे ही होती है | बादल किसी के होते हैं और बरखा किसी और के हिस्से होती है | प्रकृति का यही न्याय है | यह भी होता है की दोनो को भीगना पड़े एक दूसरे के बादल से ! अलग अलग | मगर साथ एक भी बौछार, एक भी रिमझिम नसीब न हो | केवल थपेड़े हों | 

दो बूँदें गिरी थी | एक भाग्य रेखा पर, एक हृदय रेखा पर लेकिन इन दोनो को मिलने वाली रेखा यहाँ न थी | हथेली को मोड़कर और टेढ़ा करके शशांक ने दोनो बूँदों को लुढ़काना चाहा ताकि दोनो पास आके किसी बिंदु पर मिल जाएँ लेकिन ऐसा हो न सका | सब नदियों का संगम नहीं होता | विधाता विरुद्ध हो तो दो बूँदों का भी संगम नहीं होता- कितना भी हाथ मोड़ो या पैर पटको |

 इतना सब करते करते साढ़े सात बज जाया करते थे और स्नेहा के जाने का वक़्त हो जाया करता था |
शशांक ने घड़ी देखी, ठीक साढ़े सात ! और शशांक खड़ा हो गया मशीनवत ! 

ऐसी ही थी वो ! ऐसे ही करती थी जान बूझ के | आधे घंटे मे शशांक की कन्डिशनिंग करके ठीक साढ़े सात पर चल देती थी | ग़लती स्नेहा की नहीं उसके अंकल की थी | उन्होने घर लौटने की डेडलाइन दे रखी थी | अगर वो साढ़े सात से मिनट भर लेट होती तो अंकल डेड हो जाते थे और लाइन यानी की लकीर पीटने लगते | शशांक की नज़र मे स्नेहा सिंड्रैला  की तरह थी | वो हमेशा उसे चिढ़ाया करता था की साढ़े सात बजते ही राजकुमारी सिंड्रैला  की तरह उसका रथ कद्दू, कोचवान चूहा और ‘पता नही क्या क्या’, ‘पता नही क्या क्या’ बन जाता था |
स्नेहा झूठा गुस्सा दिखती |

-        जी नही ! मैं सिंड्रैला नही मैं तो रैपुन्ज़ेल हूँ, रैपुन्ज़ेल !
और फिर वो आँखों को गोल गोल नचाकर बच्चों सी मासूमियत से कहती,ऊँची आवाज़ में  –


रैपुन्ज़ेल !sss  रैपुन्ज़ेल sss !! 
बाल नीचे करो !!!

थोड़ा स्टाइल से और बेहद मासूम ढंग से एक बाल सुलभ मुस्कान उसके चहरे पे फैल जाती | यह देख कर शशांक को उस पर खूब प्यार आता और दोनो ज़ोर ज़ोर से हँसने लगते | ठहाके | काफ़ी लंबे ठहाके | ज़ोर की हँसी |

इतना सोचते ही शशांक की आँखों से कुछ पानी और रिसा और ठहाकों और हँसी की कल्पना हल्की सिसकियों की सच्चाई में तब्दील हो गयी |

वो खुद को रैपुन्ज़ेल कहती थी शशांक को उसी ने यह कहानी सुनाई थी | कहानी – जितनी उसे ठीक से याद है- कुछ इस तरह से है- यह कहानी रैपुन्ज़ेल की नहीं है |  यह कहानी है “स्नेहा की रैपुन्ज़ेल की”- या खुद स्नेहा की है |

स्नेहा बोली- रैपुन्ज़ेल एक सुन्दर राजकुमारी थी | वो बहुत ही ज़्यादा सुन्दर थी | ठीक मेरी तरह; और यह कहकर उसने शशांक के हाथ से अन्नानास छीनकर मुँह में डाल लिया और शरारत से मुस्काने लगी |
शशांक – हो ही नहीं सकता ! वो राजकुमारी थी, और तुम तो पूरी गुलाम हो ! अपने अंकल की गुलाम ! साढ़े सात बजे की साढ़े साती की गुलाम ! 

स्नेहा (तुनक कर)- हटो ! तुम्हे क्या पता? मेरी आँखों की तरह बड़ी आँखें थी रैपुन्ज़ेल की !

और वो कहानी सुनती जाती, बिना रुके- बिना शशांक को देखे हुए | केवल कहती जाती, बोलती जाती और बीच बीच में अन्नानास खाती जाती | शशांक थोड़ा सुनता- बाकी और भी कोशिश करता सुनने की, कम सुन पता क्योंकि आँखें उसके कानों को हरा देती थी | उसे पता नहीं होता था की वो करे तो करे क्या ! सुने या देखे ! अगर देखे भी तो क्या क्या देखे ?

उसकी आँखो में देखे या आँखों से बाहर झाँकता उसका मासूम बचपन जो अभी ज़िंदा था | उसके उड़ते हुए बाल देखे या पीछे आसमान में घर लौटते परिंदों की लंबी कतार जो उसके बालों को छूते हुई जाती थी, इस छोर से उस छोर तक | और वो खो जाता था कहीं दूर क्षितिज में |



(2)



धड़ाक !!!
स्नेहा ने ज़ोर से उसके हाथ पर हाथ पटका | 
-           हेलो! कहाँ हैं आप? सुनी आपने कहानी रैपुन्ज़ेल की? मुझे नहीं लगता, आप तो पता नहीं कहाँ खोए हैं!
-           ओह! सॉरी…मैने वो कहानी सुनी पर पूरी नहीं सुन पाया…वहाँ तक तो याद है मुझे…जहाँ तुम कह रही थी की रैपुन्ज़ेल की आँखें बहुत सुंदर थी- बिल्कुल सिंड्रैला की तरह ! शशांक ने शरारत की |

-           ओहो! वो तो पहला ही वाक्य था… वहीं पर अटके हैं जनाब!
-           आपकी आँखों में अटक गये थे | बड़ी ख़तरनाक हैं | चलो कहानी सुनाओ न! अच्छा सुना लेती हो “तुम”!

यह एक और ख़ास बात थी, शशांक का स्नेहा को इस तरह से संबोधित करना |
अक्सर उसके वाक्य “आप” से शुरू होते थे और “तुम” पर ख़त्म होते थे | स्नेहा को देखते ही उसके मन में जो प्रेम जनित सम्मान पैदा होता था वह उसके मुँह से “आप” के रूप में सुनाई देता था और वाक्य के ख़तम होते होते वो उसकी अपनी  सिंड्रैला बन जाती थी- और वो "तुम" पर आ जाता था | सम्मान से अपनेपन तक का यह सफ़र निमिष भर में एक ही वाक्य में देखा जा सकता था- “आप” से “तुम” तक!

शशांक- चलिए फिर से शुरू करिए, रैपुन्ज़ेल की परी कथा, जल्दी!
-           ओके, सुनिए सरकार, रैपुन्ज़ेल एक सुंदर राजकुमारी थी जिसकी ख़ासियत उसकी सुंदर आँखें नहीं उसके खूब लंबे सुनहरे बाल थे | खूब लंबे- इतने लंबे की वो अगर अपने बाल किले की खिड़की से नीचे लटका दे तो ज़मीन को छू ले उसके बाल !
-           मोटी चुटिया बनाती होगी | शशांक ने शरारत से कहा |
-           (स्नेहा बिना ध्यान दिए) और सुनो! बेचारी को एक चुड़ैल ने किले के सबसे ऊपर, एक कंगूरे पर क़ैद कर रखा था क्यूंकी वह उसकी सुंदरता से जलती थी |

-           चुड़ैल! वह भी है! वाह ! वैसे तुम्हारे अंकल ज़्यादा सख़्त हैं या आंटी? शशांक ने फिर से शरारत की |
स्नेहा (आँखें तरेरते हुए)- कहानी सुननी है या नौटंकी करनी है | मेरी आंटी बहुत अच्छी हैं | हुंह ! चुड़ैल होगी तुम्हारी आंटी!!

शशांक ने अन्नानास का एक जूठा, आधा खाया हुआ टुकड़ा स्नेहा के मुँह में डाल दिया | ज़बरदस्ती | 
-           ओहो! बच्चा सेंटी हो गया! हा! हा! हा! मैं तो मज़ाक कर रहा था आप तो सीरियस हो गयीं! चलो सुनाओ जी चुड़ैल से आगे की कहानी |

स्नेहा (घड़ी देखते हुए)- सवा सात हो गये हैं | पंद्रह मिनट हैं | सुनना है तो सुना वरना…
-           ओके ओके …
-           हाँ तो वो चुड़ैल रैपुन्ज़ेल की सुंदरता से जलती थी और उसने उसे क़ैद कर रखा था | 
( अन्नानास ख़त्म होने वाला था, उसने एक बचा टुकड़ा झटके से उठा लिया ताकि शशांक खा न ले )

 -           तभी वहाँ से एक सजीला राजकुमार निकला जिसे देखकर रैपुन्ज़ेल अपनी सुध बुध खो बैठी | 
शशांक (टशन में कॉलर ऊपर करते हुए) ओहो! सजीला राजकुमार भी है! सही है भाई !
-           हाँ जी| उसने जैसे ही रैपुन्ज़ेल को देखा तो वा मंत्रमुग्ध हो गया | दोनो को प्यार सा हो गया! लव एट फ़र्स्ट साइट! वॉव!

स्नेहा चहचहा कर  बोली और वो अन्तिम टुकड़ा अन्नानास का बचा हुआ सा शशांक के मुँह में डाल दिया |
-           फिर क्या हुआ? (शशांक ने उत्सुकता से पूछा)
फिर राजकुमार ने ज़ोर से कहा- 

रैपुन्ज़ेल !sss  रैपुन्ज़ेल sss !! 
बाल नीचे करो !!!

 रैपुन्ज़ेल ने बॉल नीचे कर दिए और राजकुमार ऊपर आ गया, उसके बालों के सहारे, खिड़की से | 
शशांक- काफ़ी रोमैन्टिक है! लेकिन कुछ ज़्यादा ही गप्पबाज़ी नहीं है ? कहकर मुस्काया.
-            गप्पबाज़ी! गप्पबाज़ी नहीं इसे रोमैन्टिक फैंटेसी कहते हैं राजा बाबू…

-           चलो आगे तो सुनाओ… क्या किया तुम्हारे राजकुमार ने ऊपर जाके? (शरारत भारी निगाहों से घूरते हुए)
स्नेहा- फिर!.....फिर!!.....फिर साढ़े सात बाज गये ! 
हा! हा! हा! 
(वो ज़ोर से हँसी और आँखें मतकाती खड़ी हो गयी)

-           चलो जी! अंकल वेट कर रहे होंगे…
-           ओहो! साढ़े साती का किला! अंकल रूपी चुड़ैल और मेरी रैपुन्ज़ेल ! (उदास स्वर में)
दोनो चलने को हुए, एक दूसरे को देखा और साथ में बोले-

1…2…3… 
रैपुन्ज़ेल !sss  रैपुन्ज़ेल sss !! 
बाल नीचे करो !!!

हा ! हा ! हा ! ठहाके लगने लगे…
शशांक अकेला बैठा पार्क की अंधेरी बेंच पर ज़ोर ज़ोर से हंसता जा रहा था… हा !हा !हा ! ...दूर से देखने वालों को यकीन था कि वह हँस रहा है क्योंकि अंधेरी बेंच पर बैठे अकेले लोगों के रोने का अंदाज़ा नहीं लग पाता | उनके आँसू तो अँधेरो में लीन हो जाते हैं लेकिन ठहाकों की आवाज़ें लोगों को उनकी खुशी का झूठा एहसास देती रहती हैं | 
वह रो भी रहा था हँस भी रहा था | कभी रो ज़्यादा रहा था तो कभी हँसी ती तादाद ज़्यादा थी | जी भरकर विरोधाभास को जी लेने पर, जी भरकर हंसते हुए रो लेने पर, वह चुप हो गया |

चुप्पी अंत है | हर चीज़ का अंत चुप्पी ही तो है | चुप्पी यानी शून्य | शशांक आसमान के शशांक को देखता रहा कुछ देर तक शून्य में…और बुदबुदाया - शशांक की नियति में शून्य ही है | शून्य ही नियति है हर शशांक की…स्नेहा तो साढ़े साती का ग्रास हुई अब इस शून्य की चुप्पी में जलते रहो शशांक | ये जो चाँदनी है न तुम्हारी, ये कोई ख़ास चीज़ नहीं…ये तुम्हारी स्नेहा का स्नेह है, जो बरसता रहता है तुम्हारी आँखों से, चाँदनी बन के…और फिर अमावस को वो भी नही होती…बस होती है तो- चुप्पी! शून्य!!

शशांक की आँख खुली और खुद को बेंच पर लेटा पाया, काफ़ी रात हो गयी थी | खाने का वक़्त था, खाने का मन न भी हो तो रस्म अदायगी का वक़्त तो था ही | मन ही मन यह सोचते हुए उठा की कल फिर से दस रुपये का अन्नानास खाएगा और स्नेहा से पूछेगा की सजीले राजकुमार ने ऊपर जाकर रैपुन्ज़ेल के साथ क्या किया |




(3)


अगले दिन भी शशांक बेंच पर था, रोज़ की ही तरह, अन्नानास के साथ…
आज आने में कुछ देरी हुई थी और शाम का झुटपुटा घिर रहा था | पार्क में कुछ बेँचें खाली थी कुछ भरी |  कुछ बेँचें पास जल रहे लैंप पोस्ट से जगमग थी तो कुछ हल्के अँधेरे मे आधी सोई, आधी जागी, अलसाई सी |

हर बात में कोई बात होती है | कोई भी बात यूँ ही बे-बात नहीं होती | अगर बात की वह छुपी हुई बात पकड़ में आ जाए तो बात निकलती जाती है और असली बात तक जा पहुचती है -जो अब तक छुपी हुई थी |
यहाँ दो बातें याद आईं शशांक को- एक मामूली सी लगने वाली और दूसरी असली वाली बात |

पहली बात यह की जब भी दोनों पार्क के गोल दरवाज़े को घुमाते हुए अंदर आते दोनों में नोक-झोंक शुरू हो जाती कि बैठना कहाँ है!
स्नेहा कहती कि उजाले वाली बेंच पर बैठेंगे | वहाँ एक दूसरे को देख सकते हैं | शशांक कहता नींद में डूबी अंधेरी बेंच पर बैठेंगे- वहाँ हमें कोई देख नही सकता और मैं तुम्हारे हाथ को अपने हाथ में लेकर बैठ सकता हूँ, बिना हँसी का पात्र बने ही | 

दूसरी और असली बात यह थी की स्नेहा उसे जान बूझकर छेड़ना चाहती थी और शशांक किसी भी कीमत पर अंधेरी बेंच पर बैठकर झुटपुटे में खो जाना चाहता था | अंधेरे मे शशांक और स्नेहा घुलकर कुछ नया सा बन जाते थे जो दुनियादारी से परे था | तब न वहाँ शशांक होता था न स्नेहा; केवल अन्नानास के टुकड़े होते थे जो उस मिश्रण का मूर्तरूप थे | 

असली बात यह भी थी की दोनों उसी अंधेरी बेंच पर बैठना चाहते थे- बस अलग अलग तरह से | 
स्नेहा चाहती थी की शशांक उसे मनाए और शशांक चाहता था की स्नेहा रूठ जाए तो हर तरह से उसे मनाऊं | और फिर वही होता हरदम की तरह- दोनों घुलकर दस रुपये का अन्नानास बन जाया करते थे |

हाँ तो राजकुमार ने ऊपर आकर रैपुन्ज़ेल के साथ क्या किया; शशांक ने स्नेहा से पूछा |
-           राजकुमार ने रैपुन्ज़ेल का हाथ थाम लिया और कहा कि वह उसे खूब प्यार देगा |यह सुनकर रैपुन्ज़ेल खुश हो गयी, उसे लगा की वह आज़ाद हो जाएगी…
-           फिर?
-           फिर दोनों भाग गये… पता है कैसे? रैपुन्ज़ेल ने अपने बाल काटकर उसकी रस्सी बनाई और दोनो किले की खिड़की के रास्ते निकल गये! इस कहानी का अंत तोड़ा कनफ्यूज़िंग है | अलग अलग लोग इसके अलग अलग अंत बताते हैं | 
  • कुछ कहते हैं की दोनों दूर देस चले गये और खुशी से रहे…
  • कुछ कहते हैं दोनो को चुड़ैल ने भागते हुए देख लिया और राजकुमार को मरवा दिया जिसके बाद रैपुन्ज़ेल उस कोठरी में ता-उम्र क़ैद रही…
  • कुछ कहते हैं की राजकुमार ने उतरने के बाद किले में आग लगा दी और कंगूरे से झाँकती चुड़ैल जलकर राख हो गयी…
  • कुछ तो यहाँ तक कहते हैं की राजकुमार गिरकर लंगड़ा हो गया था और बाद में किसी ज़हरीले पानी के कुएँ में गिरकर दर्दनाक तरीके से मर गया था|
शशांक गहरी सोच में डूब गया और पूछा- तो तुम्हे क्या लगता है क्या हुआ होगा?
अरे लगना क्या है? सिंपल है दोनो दूर देस चले गये और खूब खुशी खुशी रहे-स्नेहा ने आँखें चमकाते हुए भोलेपन से कहा |
-           और वो बाकी की कहानियाँ? उनके बारे में तुम्हे क्या कहना है? 
-           ओह…वो सब अफवाहें होंगी | चुड़ैल ने खुद ही फैलाई हों शायद | खुद की इज़्ज़त बचाने के लिए |
शशांक मुस्काते हुए- वाह चुड़ैल ने फैलाई होंगी अफवाहें! तो तुम्हे लगता है की यह कहानी सच है?
स्नेहा उचक कर बोली- और क्या! यह कहानी पूरी तरह सच है…एक्चुअली यह कहानी है ही नही, ये सच है |

उस दिन शशांक को यह कहानी “एक रूमानी ख्याल” भर लगी थी मगर आज उसे हर सच में वही कहानी दिखाई दे रही थी | दुनिया की हर कहानी में एक राजकुमार है, एक रैपुन्ज़ेल है और एक चुड़ैल भी है | एक सुदूर देस है जो सपनों सरीखा मालूम होता है | चुड़ैल से राजकुमारी को बचा पाना दो बातों पर निर्भर करता है-

एक, रैपुन्ज़ेल के बाल उतने लंबे हैं की नहीं, की राजकुमार किले के नीचे से ऊपर चढ़ पाए और इतने मजबूत हैं की नहीं कि उतरते वक़्त उसकी रस्सी दोनों का बोझ उठा पाए |ये बाल दोनों के बीच के प्यार का प्रतीक हैं |

दो, राजकुमार की हिम्मत और ताक़त, कि कहीं चुड़ैल से सामना हो जाए तो भाग खड़ा होगा या लड़ेगा | ये हिम्मत ही शशांक खुद में खोज रहा था | यह चुड़ैल “यथार्थ की बेड़ियों” की प्रतीक थी |
प्रतीकात्मकता हावी थी |

असली प्रतीक वो बेंच थी | शशांक और स्नेहा बस उस बेंच पर बैठने के लिए बने थे | साथ साथ दूर तक चलने के लिए नहीं | दोनों अंधेरी सोती बेंच के साथी थे जो साढ़े सात बजे “यथार्थ की बेड़ियों” में जकड़कर दुनिया की अदालत में पेश हो जाया करते थे |




(4)


 शशांक एक मध्यम वर्गीय परिवार से था- तीन लड़कियों के बाद इकलौता लड़का | उन तीन लड़कियों की शादी की जा चुकी थी और इस तरह हुए कुल खर्च को उस लड़की के बाप से वसूला जाना था जो कि शशांक से शादी करती | स्नेहा सिद्धान्ततः दहेज के खिलाफ थी | वास्तविकतः उसके माँ बाप दहेज देने में असमर्थ थे | यहाँ सिद्धांत की जड़ वास्तविकता के धरातल में गहरी थी |  

शशांक भी सिद्धान्ततः दहेज के खिलाफ था | वास्तविकतः वह अपने माँ बाप के खिलाफ नहीं जा सकता था |शशांक लालची नहीं था लेकिन वह अपने माँ बाप को आर्थिक मूल्यों के सामने मानवीय मूल्यों या सिद्धांत का महत्व समझा पाने में असमर्थ था |वह उनकी इज़्ज़त करता था और इसी एक बात का वास्ता देकर खुद को अच्छा लड़का मानता था |

शशांक के पिता जी ने लाखों का लोन लेकर तीन लड़कियों की शादी की थी | अगर वो शशांक की शादी में दहेज लेंगे नहीं तो लोन कैसे चुकाएँगे? यही सच था बाकी सब इसके सामने झूठ और बौना था | 
“इश्क़ से दुनिया नहीं चलती, इश्क़ से कुछ नहीं चलता… यहाँ तक की इश्क़ भी ज़्यादा दिन नहीं चलता”

यहाँ तक सोचने के बाद शशांक का दिमाग़ इस बहस- मुबाहिसे में लग जाता की वह स्नेहा से प्यार करता भी है या ये केवल शारीरिक आकर्षण मात्र है | काफ़ी सोच लेने के बाद इसे शारीरिक आकर्षण मान लेने में ही भलाई लगती क्योंकि इससे पिता जी का लोन चुकता हो जाता था |

अगर लोन को नज़र अंदाज़ कर भी दो तो “जाति” का क्या? वो दोनो अलग अलग जाति से थे |
शशांक कहता था की उसे अपनी माँ पर गर्व है, अपने गाँव पर भी उसे अपनी कम्युनिटी पर और इस तरह अपनी जाति पर भी गर्व है | यह गर्व अंत में इकट्ठा होकर उसे समूचे देश पर गर्व करने का हौसला और ज़ज़्बा देता था | 

गर्व अचानक ही आसमान से नहीं गिरता | इसे धीरे धीरे इकट्ठा करना होता है | चुटकी चुटकी गर्व खरोंच खरोंच कर इकट्ठा किया था शशांक ने- एक चुटकी माँ से, एक चुटकी गाँव से, एक चुटकी अपनी कम्युनिटी से और एक चुटकी अपनी जाति से- इन चार चुटकियों भर गर्व से देश की गौरवशाली और गर्वीली परंपरा की नीव रखी गयी थी |

वह “जातिवादी” नहीं था- वरना स्नेहा से प्रेम नहीं करता | मगर उसे अपनी जाति पर “गर्व” था- इसलिए वह उससे शादी नहीं कर सकता था | इन सब बातों के बावजूद शशांक एक अच्छा लड़का था और स्नेहा भी ऐसा ही मानती थी क्योंकि उसने यह सब कभी उससे छुपाया नहीं था | उसके माँ बाप भी उसे अच्छा लड़का मानते थे क्योंकि उन्हे इस अन्तर्जातीय प्रेम प्रसंग के विषय में कुछ पता नहीं था |

शशांक को हर तरीके से अच्छा साबित करने के बाद स्नेहा कभी कभी खुद के बारे में सोचने लगती थी | उसे पता था की शशांक इतना “अच्छा” है की उसे “मिल” नहीं सकता बस उससे अंधेरे वाली बेंच पर "मिल" भर सकता है |

स्नेहा भी अच्छी लड़की थी और अच्छी बनी रहने के चक्कर में काफ़ी पढ़ लिख गयी थी | एक अच्छी फार्म में नौकरी कर रही थी और करते रहना चाहती थी | शशांक हाउसवाइव्स को सम्मान की नज़र से देखता था और इस सम्मान पर कोई आँच आते हुए नहीं देख सकता था | इसी सम्मान के चलते स्नेहा को अपनी नौकरी छोड़नी थी, अगर दोनों शादी करते तो ! जब तक दोनों मे से कोई भी शादी न करता वो नौकरी कर सकती थी और दोनों अंधेरी बेंच पर बैठकर दस रुपये का अन्नानास खा सकते थे |

वैसे स्नेहा खुले विचारों वाली एक तरक्की पसंद लड़की थी लेकिन शशांक को पसंद करने के बाद से थोड़ा ठहर गयी थी | यह ठहराव कहाँ से आया था पता नहीं पर अब उसे ठहर जाना भी मंज़ूर था अगर ठहराव में शशांक का साथ हो |
ढाई साल पहले वो शशांक से मिली थी और उसकी हर बात से प्रभावित थी| शशांक एक आकर्षक और ईमानदार लड़का था वह होनहार और सभ्य तो था ही बहुत संवेदनशील भी था | एक बार स्नेहा ने उससे पूछा-

-           तुम्हे अपने माता पिता या मुझमे से किसी एक को चुनना हो तो किसे चुनोगे?
-           पापा माँ को! तुम्हें छोड़ दूँगा | अगर पच्चीस साल तक प्यार देने वालों का न हुआ और तुम्हे चुन लिया तो कुछ सालों बाद तुम्हे भी छोड़ दूँगा न? मैं कमज़ोर हूँ, धोखेबाज़ नहीं, मैं झूठ नहीं बोलता कायर भर हूँ…

कहते हुए शशांक की आँखें भर आई, स्नेहा ने मुस्का कर उसके आँसू पोछते हुए कहा-
-           मुझे पता था तुम्हार जवाब, बस यूँ ही पूछ लिया |
कहकर स्नेहा की आँखें छलछला उठी | 

समय बीतने के साथ और दोनों का प्रेम प्रगाढ़ होने कारण “यथार्थ की बेड़ियों” की  तीसरी शर्त की गाँठ खुल गयी थी- यानी वह उसे नौकरी करने देने पर राज़ी था, माँ पापा को भी मना लेता मगर बाकी दोनो शाश्वत सत्य- जाति और लोन- उनके निजी स्वार्थ या प्रेम से ऊपर थे |

एक बार उसने मज़किया लहजे में कहा था-
मैं अपने बच्चों की शादी इंटरकास्ट करवा दूँगा मगर खुद कभी ऐसा नहीं करूँगा, मुझे खुद को दुख देने का हक़ है, अपने माँ बाप को गाँव भर में जगहंसाई का पात्र बनाने का कोई हक़ नही!

यह बोलने के बाद वह चुप हो गया था और अंदर ही अंदर चीखने लगा था | अब जाके उसे लगा था की उसकी जाति “गर्व का विषय” और “नाम के टाइटल” से कहीं आगे बढ़कर है |ये उसके खून में घुलकर काला सा कर रही है | दर्द हो रहा है | चीखें अंदर गूँज रही हैं पर निकल नहीं सकती | गर्व की अनुभूति जा रही है | स्नेहा भी जा रही है |सूइयां सी चुभ रही हैं | वह हाथों में हज़ारों सूइयां लेकर खुद के शरीर में चुभो रहा है | काला खून बह रहा है | सुकून मिल रहा है | सारा खून बह जाने के बाद भी वह मरा नहीं था |

दोनों के रिश्ते में कुछ ज़्यादा ख़ास नहीं था- सिवाय ईमानदारी के | शशांक को केवल इसी बात का संतोष था की उसने स्नेहा से न तो कभी कुछ छिपाया था न झूठ कहा था | स्नेहा ने भी ऐसा ही किया था | वह अक्सर कहती थी- मुझे लेकर परेशान मत हुआ करो |अगर तुम्हारे घर में सब मुझे अपनाएँगे तो ही मुझसे शादी करना | मैं तुम्हारे रास्ते में कभी नहीं अवंग; कहकर मुस्का देती |

दोनों अक्सर सोचते थे की इस जानलेवा ईमानदारी- की दोनों साथ साथ कभी किसी किनारे नहीं लग सकते- के बावजूद एक दूसरे से मिलते ही क्यूँ हैं?
इसका जवाब एक ही शब्द में था- “आस”! शशांक को चीज़ों के बेहतर होने की कोई उम्मीद न थी| वह सच कह चुका था- काफ़ी पहले | फिर उसे किस चीज़ की आस थी? शशांक को बस शाम की आस होती थी और स्नेहा से मिलने की, बस और कुछ भी नहीं, जिसे वह अवसाद के क्षणों मे शारीरिक आकर्षण कहकर खुश हो लेता था |
आस का पलड़ा स्नेहा की ओर ज़्यादा झुका था उसे हमेशा लगता रहता था की शायद सब कुछ ठीक हो जाएगा और शशांक उसे मिल जाएगा |




(5)


तीसरे दिन या फिर चौथे दिन शायद, उसे याद नहीं थी गिनती दिनों की, वह फिर से पार्क में था | दिनों की गिनती करना कठिन काम है, जब सारे दिन एक से हों- हर आने वाला कल बीते कल की फोटोकोपी सा हो और न तो इनकी पहचान हो पाए न ही गिनती |

सोच रहा था की उसके हिस्से की दुनियादारी पेंडिंग है | ऑफिस का काफ़ी काम इकट्ठा हो गया है | सब निपटाना है | स्नेहा का तो ट्रान्सफर हो चुका  | अब थोड़े न आएगी यहाँ | यहाँ क्या रखा है ? इस पार्क में या अन्नानास में? ये तो केवल प्रतीक हैं…सिंबल्स!

आदमी प्रतीकों में जीता है | प्रतीकों के लिए जीता है | मरता है तो एक प्रतीक बन जाता है | अगर प्रतीक बनने लायक नहीं होता है तो यह उसकी असफलता का प्रतीक होता है |

पार्क और अन्नानास उसके लिए स्नेहा के प्रतीक थे | स्नेहा थी | अगर कोई गुलाबी कपड़ों वाली लड़की दिख जाती तो उसे अपनी पहली मुलाक़ात याद आ जाती | सफेद कपड़ों से स्नेहा का जन्मदिन और छोटे बच्चों की आँखों में स्नेहा की आँखें दिखने लगती |

प्रतीकों के बारे में सोचते सोचते उसे अन्नानास की याद आ गयी | वह उठा और बाहर की तरफ बढ़ा |
सोच रहा था जाने क्या सोचती होगी स्नेहा उसके बारे में | उसकी कायरता के बारे में | उस कहानी के अंत के बारे में | रैपुन्ज़ेल अभी भी क़ैद थी | राजकुमार गिरकर लंगड़ा हो गया था और ज़हरीले पानी के कुएँ में गिर चुका था, मरना बाकी था | 
अब उसे एहसास हुआ कि क्यों लोग इस एक कहानी के अलग अलग अंत बताते हैं| यह कहानी एक प्रतीक है बस | प्रेम का प्रतीक | इसके कई अंत हो सकते हैं लेकिन बुरे से बुरे अंत का, शुरुआती प्रेम कथा पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता, न ही उन दोनों के प्रेम पर पड़ता है | कहानी तब भी वही रहती है- प्रेम का प्रतीक | 

प्रतीकों में डूबता उतराता वा सड़क के छोर पर पहुँचा | जहाँ अन्नानास वाला बाबा हुआ करता था | आज नहीं था | उसने पान वाले से पूछा –
-           बाबा कहाँ है?
-           वो नहीं आया, आएगा भी नहीं…
-           क्यूँ?
-           चला गया…
-           कहाँ चला गया?
-           परलोक…
-           परलोक??!!
-           हाँ, आज सुबह तड़के…
-           क्या हुआ था??
-           पता नहीं | खाँसता था… कैंसर रहा होगा…
-           उसका नाम क्या था?
-           पता नहीं… बाबा कहते थे सब…

उसका मरना भी एक प्रतीक था शायद ! प्रतीकों की बाढ़… अंदर से बाहर तक !
शशांक ने झुक कर ज़मीन से अन्नानास के कुछ छिलके उठा लिए और उन्हे जेब में रख लिया | एक अध्याय का अंत हुआ था शायद !

उसकी साँसें भारी चलने लगी जैसे उसके प्रेम के प्रतीक की कल रात मौत हुई हो और अस्थि-शेष उसकी जेब में हों | कई मौतें एक साथ हुई थी उस मौत के साथ- कई प्रतीक मरे थे |

उसने हाथ की दो अंगुलियों को नाक के सामने रखा | साँसें चल रहीं थी- गर्म थी मगर, तेज़ बुखार हो जैसे | यह उसके ज़िंदा होने का प्रतीक था | उसके पैर भी चल दिए पर जेब में रखे अन्नानास के छिलके अब भी बीते कल की तरह उसका पीछा नहीं छोड़ रहे थे | 




*स्वर* 





 

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